कबीर का जीवन परिचय –
कबीर का जन्म 1398 ई में वाराणसी के लहरतारा में हुआ था। उनकी माता का नाम ‘नीमा’ और पिता का नाम ‘नीरू’ था। कबीर के जन्म के बारे में कोई एक राय निश्चित नहीं है।
कहा जाता है कि कबीर नीमा और नीरू की अपनी संतान नहीं थे , उन्हें वो लहरतारा ताल के पास पड़े हुए मिले थे। उन्हें वो अपने घर ले आए और अपना पुत्र मान लिया। कबीर की रचित पंक्तियों एवं किंवदंतियों से पता चलता है कि वो निरक्षर थे।
उन्हें जो भी ज्ञान प्राप्त हुआ वो सब सत्संग और देशाटन आदि से प्राप्त हुआ। और उन्होंने उसी ज्ञान को प्रमुखता दी जो उन्हें आंखो देखे सत्य और अनुभव से प्राप्त हुआ। वे जाति , संप्रदाय , वर्ण आदि द्वारा किए जाने वाले भेदभाव को नहीं मानते थे बल्कि प्रेम, समानता एवं सदभाव का समर्थन करते थे।
कबीर हिन्दू-मुसलमान जैसे धर्म भेद को नहीं मानते थे बल्कि दोनों धर्मों के सत्संग किया करते थे और उनकी अच्छी बातों को आत्मसात कर लिया करते थे। वो कर्मकांड के घोर विरोधी थे और एक ही ईश्वर को मानते थे।
कबीर भक्तिकाल की निर्गुणधारा के कवि हैं। कबीर की वाणी के संग्रह को ‘बीजक’ नाम से जानते हैं। बीजक के तीन भाग हैं रमैनी , सबद और साखी। कबीर मित्र,माता,पिता आदि में ही परमात्मा को देखते थे।
कबीर शान्तिप्रिय थे एवं सत्य और अहिंसा के समर्थक थे। समस्त संत कवियों में कबीर का स्थान अद्वितीय है। कबीर का पूरा जीवन काशी में ही बीता पर अपने अंतिम समय में ना चाहते हुए भी वो मगहर चले गए थे। मगहर में ही 119 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया।
कबीर के पद कविता का सारांश –
प्रस्तुत पदों में कवि ने संसार में परमात्मा की व्यापकता की व्याख्या की है। वो कहते हैं की परमात्मा हर एक के हृदय में विद्यमान है, परमात्मा सृष्टि के कण कण में व्याप्त है। परमात्मा उस ज्योति के समान है जिसका प्रकाश सम्पूर्ण संसार में फैला हुआ है और जिसे कोई रोक नहीं सकता।
संसार के लोग आत्मा और परमात्मा को अलग अलग मानते हैं किन्तु कबीर ने दोनों को एक ही माना है। इस बात को समझाने के लिए कवि ने विभिन्न उदाहरणों का उपयोग किया है।
इसके लिए वो कभी पवन कभी प्रकाश तो कभी लकड़ी और बढ़ई का उदाहरण देते हैं। कबीर का मानना है कि माया के कारण इनमें अंतर दिखाई देता है वास्तव इनमें कोई अंतर नहीं है।
कबीर कहते हैं कि संसार के लोग पागल हो गए हैं और इसलिए अपने अंदर कि शक्ति को अनदेखा कर बाहरी आडंबर के पीछे भाग रहे हैं। सच का विरोध और झूठ का विश्वास करते हैं।
राम-रहीम के नाम पर लड़ने वाले ईश्वर का मर्म नहीं जान सकते। कबीर ने अपने इन पदों में नियम , धर्म, छाप , तिलक के पीछे लड़ने वालों की निंदा की है।
कबीर के पद कविता –
पद 1
हम तौ एक करि जांनां ।
दोइ कहैं तिनहीं कौं दोजग जिन नाहिंन पहिचांनां।
एकै पवन एक ही पानीं एकै जाेति समांनां।
एकै खाक गढ़े सब भांडै एकै काेंहरा सांनां।
जैसे बढ़ी काष्ट ही कार्ट अगिनि न काटे कोई।
सब घटि अंतरि तूही व्यापक धरै सरूपै सोई।
माया देखि के जगत लुभांनां कह रे नर गरबांनां
निरभै भया कछू नहि ब्यापै कहैं कबीर दिवांनां।
पद 2
सतों दखत जग बौराना।
साँच कहीं तो मारन धार्वे, झूठे जग पतियाना।
नमी देखा धरमी देखा, प्राप्त करें असनाना।
आतम मारि पखानहि पूजें, उनमें कछु नहि ज्ञाना।
बहुतक देखा पीर औलिया, पढ़े कितब कुराना।
कै मुरीद तदबीर बतार्वे, उनमें उहैं जो ज्ञाना।
आसन मारि डिभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना।
पीपर पाथर पूजन लागे, तीरथ गर्व भुलाना।
टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना।
साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना।
हिन्दू कहैं मोहि राम पियारा, तुर्क कहैं रहिमाना।
आपस में दोउ लरि लरि मूए, मम न काहू जाना।
घर घर मन्तर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना।
गुरु के सहित सिख्य सब बूड़े, अत काल पछिताना।
कहैं कबीर सुनो हो सती, ई सब भम भुलाना।
केतिक कहीं कहा नहि माने, सहजै सहज समाना।
कबीर के पद कविता का भावार्थ –
हम तौ एक करि जांना ।
दोइ कहैं तिनहीं कौं दोजग जिन नाहिंन पहिचांनां।
एकै पवन एक ही पानीं एकै जाेति समांनां।
एकै खाक गढ़े सब भांडै एकै काेंहरा सांनां।
जैसे बढ़ी काष्ट ही कार्ट अगिनि न काटे कोई।
सब घटि अंतरि तूही व्यापक धरै सरूपै सोई।
माया देखि के जगत लुभांनां कह रे नर गरबांनां
निरभै भया कछू नहि ब्यापै कहैं कबीर दिवांनां।
कबीर के पद भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कविता कबीर के पद से ली गयी हैं। इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि वो उस परमात्मा को जानते हैं जो एक है और जिन्होंने सम्पूर्ण संसार की रचना की है और वो संसार के कण कण में व्याप्त हैं। जो अज्ञानी हैं वो परमात्मा और संसार को अलग अलग मानते हैं।
वे कहते हैं कि संसार में एक ही वायु एक ही जल और एक ही परमात्मा का प्रकाश फैला हुआ है। इन पंक्तियों में कबीर ने कुम्हार की तुलना परमात्मा से की है , वे कहते हैं कि जिस प्रकार कुम्हार एक ही मिट्टी से तरह-तरह के आकार गढ़ता है और बर्तनों का निर्माण करता है ठीक उसी प्रकार परमात्मा ने भी एक ही मिट्टी से हम सभी की रचना की है।
जैसे एक बढई सिर्फ लकड़ी को ही काट सकता है उस अग्नि को नहीं काट सकता जो उसमें समाई हुई है।ठीक उसी प्रकार मृत्यु के बाद सिर्फ शरीर मरता है उसमें समाई आत्मा कभी नहीं मरती। वे कहते हैं कि इस संसार की माया लोगों को आकर्षित करती है उन्हें अपनी ओर खींचती है, और इंसान इन क्षणभंगुर वस्तुओं में फँसते चले जाते हैं और उनपर गर्व भी करते हैं ।
कबीर कहते हैं कि लोगों को सांसारिक मोहमाया से मुक्त होकर एक ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए। जो इस सांसारिक मोहपाश से मुक्त हो जाता है उसे किसी भी चीज़ का भय नहीं रहता।
सतों दखत जग बौराना।
साँच कहीं तो मारन धार्वे, झूठे जग पतियाना।
नमी देखा धरमी देखा, प्राप्त करें असनाना।
आतम मारि पखानहि पूजें, उनमें कछु नहि ज्ञाना।
बहुतक देखा पीर औलिया, पढ़े कितब कुराना।
कै मुरीद तदबीर बतार्वे, उनमें उहैं जो ज्ञाना।
आसन मारि डिभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना।
पीपर पाथर पूजन लागे, तीरथ गर्व भुलाना।
टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना।
साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना।
हिन्दू कहैं मोहि राम पियारा, तुर्क कहैं रहिमाना।
आपस में दोउ लरि लरि मूए, मम न काहू जाना।
घर घर मन्तर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना।
गुरु के सहित सिख्य सब बूड़े, अत काल पछिताना।
कहैं कबीर सुनो हो सती, ई सब भम भुलाना।
केतिक कहीं कहा नहि माने, सहजै सहज समाना।
कबीर के पद भावार्थ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कविता ‘कबीर के पद’ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों में कबीर ने बाहरी दुनिया के दिखावों पर प्रहार किया है।
वे कहते हैं कि संसार के लोग पागल हो गए हैं, सच सुन कर मारने को दौड़ते हैं और झूठ पर इनको पूरा विश्वास हो जाता है। कबीर कहते हैं कि उन्होंने ऐसे साधू संतों को देखा है जो व्रत-उपवास रखते हैं, नियमों का पालन करते हैं, अपनी आत्मा की आवाज़ को अनसुनी करते हैं और धर्म के नाम पर दिखावा करते हैं, जिसमे कि कुछ भी सच्चाई नहीं होती है।
कबीर ने बहुत से पीर -फकीर देखे हैं जो कि धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं और अपने मुरीदों को परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं , ऐसे लोग खुद अज्ञानी होते हैं इसलिए वास्तविकता से परे बाहरी आडंबरों में उलझे रहते हैं।
ये लोग आसन लगाकर समाधि में बैठे रहते हैं पत्थर की मूर्तियों वृक्षों को पूजते हैं तीर्थ आदि पर जाते हैं और सोचते हैं कि वो ईश्वर के सच्चे भक्त हैं और ऐसा कर के अपने अभिमान को संतुष्ट करते रहते हैं पर सच्चाई तो यह है कि यह सब बस सांसरिक माया है वास्तविकता तो कुछ और ही है।
कबीर कहते हैं कि कुछ लोग टीका चन्दन लगाते हैं गले में माला सर पर टोपी पहनते हैं और खुद को ज्ञानी समझते हैं और दूसरों को ज्ञान की बातें बताते हैं जबकि असल में तो उन्हें खुद ही कुछ भी ज्ञान नहीं होता है।
कबीर आगे कहते हैं कि हिन्दू को राम प्रिय लगता है मुसलमान को रहीम प्रिय लगता है और धर्म के नाम पर दोनों एक दूसरे से लड़ते रहते हैं पर अपने अंदर कोई नहीं झाँकता है।
ये दोनों ही मूर्ख हैं क्योंकि जिसे ये भक्ति समझते हैं वो तो भक्ति है ही नहीं , इन्होंने ईश्वर को कभी समझा ही नहीं। कबीर कहते हैं कि ऐसे लोग खुद तो अज्ञानी होते हैं परंतु दूसरों को धर्म का ज्ञान बांटते फिरते हैं।
ऐसे गुरुओं के साथ साथ उनके शिष्य भी मूर्ख ही होते हैं जो कि बाद में पछताते हैं। इस प्रकार कवि कहते हैं कि परमात्मा एक है और अगर परमात्मा को पाना है तो सत्य और प्रेम का रास्ता अपनाओ और दिखावे की दुनिया से दूर रहो।
प्रश्न 1. कबीर की दृष्टि में ईश्वर एक है। इसके समर्थन में उन्होंने क्या तर्क दिये हैं?
उत्तर– कबीर मानते हैं कि ईश्वर एक ही है और इसके समर्थन के लिए उन्होंने कई तर्क दिये हैं। वे कहते हैं कि वायु,जल, पृथ्वी,अग्नि और आकाश इन पाँच तत्वों से मिलकर मनुष्य की रचना हुई है।
इन सब की रचना एक ही मिट्टी से हुई है। परमात्मा एक है और उसी एक परमात्मा ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है। सारे संसार में उसी परमात्मा का प्रकाश विद्यमान है।
प्रश्न 2. मानव शरीर का निर्माण किन पाँच तत्वों से हुआ है?
उत्तर– कबीर जी कहते हैं कि मानव शरीर का निर्माण वायु, अग्नि, जल, आकाश और धरती इन पाँच तत्वों से हुआ है। और इन पांचों तत्वों का निर्माण परमात्मा ने एक ही मिट्टी से किया है।
प्रश्न 3. जैसे बाढी काष्ट ही काटे अगिनी ना काटे कोई ।
सब घटि अंतरि तूंही व्यापक धरै सरुपै सोई ।
इसके आधार पर बताइये कि कबीर कि दृष्टि में इश्वर का क्या स्वरूप है?
उत्तर– प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर जी कहते हैं कि जिस प्रकार बढ़ई लकड़ी तो काट सकता है पर उसके अंदर की आग नहीं काट सकता उसी प्रकार मनुष्य का शरीर नश्वर है, उसका शरीर तो मर जाता है परंतु उसके अंदर की आत्मा हमेशा जीवित होती है।
अंदर जो आत्मा होती है उसमें भी परमात्मा का निवास होता है।
प्रश्न 4. कबीर ने अपने को दीवाना क्यों कहा है?
उत्तर– कबीर जी मानते हैं कि जो लोग बाहरी आडंबर और मोहमाया से मुक्त हो जाते हैं उन्हें किसी भी बात का भय नहीं होता है। कबीर स्वयं भी इन सांसारिक आडंबरों से मुक्त हैं और इसीलिए वो भयमुक्त भी हो चुके हैं।
उन्हें सांसरिक बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता और इसीलिए वो खुद को दीवाना कह रहे हैं।
प्रश्न 5. कबीर ने ऐसा क्यों कहा है कि संसार बौरा गया है?
उत्तर– कबीर कहते हैं कि संसार बौरा गया है यानि कि पागल हो गया है। इसको सच सुन के गुस्सा आता है मारने को दौड़ता है और झूठ पे विश्वास करता है। नियम के नाम पर व्रत उपवास करता है।
माला , टोपी ,तिलक ,छाप आदि पहनता है और पत्थर एवं वृक्ष की पूजा करता है। गीता, कुरान पढ़ के अपने आप को विद्वान समझता है और राम रहीम के नाम नाम पर आपस में लड़ाई करता है। खुद अज्ञानी होकर दूसरों को परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग बताता फिरता है।
प्रश्न 6. कबीर ने नियम और धर्म का पालन करने वाले लोगों की किन कमियों की ओर संकेत किया है?
उत्तर– कबीर कहते हैं कि जो लोग बाहरी दिखावा करते हैं वो लोग अंदर से तो अज्ञानी होते हैं पर दूसरों को ज्ञान की बातें सिखाते फिरते हैं। खुद तो परमात्मा का ज्ञान नहीं होता पर दूसरों को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं।
आसन लगा कर ध्यान साधना करते हैं पर अपने अंदर के परमात्मा से अंजान होते हैं। धार्मिक किताबों और छाप तिलक में ईश्वर को ढूंढते हैं जबकि वो तो हर मनुष्य के अंदर ही होता है।
प्रश्न 7. अज्ञानी गुरुओं के शरण में जाने पर शिष्यों की क्या गति होती है?
उत्तर– अज्ञानी गुरुओं के शरण में जो भी जाते हैं वो भी मूर्ख बन कर रह जाते हैं । सांसारिक मोहमाया और आडंबर में उलझ जाते हैं। आधे अधूरे ज्ञान की वजह से ऐसे शिष्य भी अपने गुरुओं की ही तरह पाखंडी बन जाते हैं और अंत में पछताते हैं।
प्रश्न 8. बाह्याडंबरों की अपेक्षा स्वयं(आत्म)को पहचानने की बात किन पंक्तियों में कही गयी है? उन्हें अपने शब्दों में लिखे ।
उत्तर– बाह्याडंबरों की अपेक्षा स्वयं को पहचानने की बात निम्नलिखित पंक्तियों में कही गयी है :
टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना।
साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना।
लोग आजकल टोपी पहनते हैं माला पहनते हैं माथे पर छाप और तिलक लगाते हैं। ये वो लोग होते हैं जो बाहरी दिखावों में विश्वास रखते हैं । ये अपनी आत्मा से अंजान होते हैं अज्ञानी होते हैं और दूसरों को ज्ञान देने और ईश्वर से मिलाने की बातें करते हैं। ऐसे दिखावों से न तो आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है और ना ही ईश्वर की।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
पद के साथ
प्रश्न. 1.
कबीर की दृष्टि में ईश्वर एक है। इसके समर्थन में उन्होंने क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर:
कबीर ने ईश्वर को एक माना है। उन्होंने इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए हैंसंसार में सब जगह एक पवन व एक ही जल है।
सभी में एक ही ज्योति समाई है।
एक ही मिट्टी से सभी बर्तन बने हैं।
एक ही कुम्हार मिट्टी को सानता है।
सभी प्राणियों में एक ही ईश्वर विद्यमान है, भले ही प्राणी का रूप कोई भी हो।
प्रश्न. 2.
मानव शरीर का निर्माण किन पंच तत्वों से हुआ है?
उत्तर:
मानव शरीर का निर्माण धरती, पानी, वायु, अग्नि व आकाश इन पाँच तत्वों से हुआ है। मृत्यु के बाद में तत्व अलग-अलग हो जाते हैं।
प्रश्न. 3.
जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई।
सब घटि अंतरि तूंही व्यापक धरै सरूपै सोई॥
इसके आधार पर बताइए कि कबीर की दृष्टि में ईश्वर का क्या स्वरूप है?
उत्तर:
कबीरदास ईश्वर के स्वरूप के विषय में अपनी बात उदाहरण से पुष्ट करते हैं। वह कहते हैं कि जिस प्रकार बढ़ई लकड़ी को काट देता है, परंतु उस लकड़ी में समाई हुई अग्नि को नहीं काट पाता, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में ईश्वर व्याप्त है। शरीर नष्ट होने पर आत्मा नष्ट नहीं होती। वह अमर है। आगे वह कहता है कि संसार में अनेक तरह के प्राणी हैं, परंतु सभी के हृदय में ईश्वर समाया हुआ है और वह एक ही है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि ईश्वर एक है। वह सर्वव्यापक तथा अजर-अमर है। वह सभी के हृदयों में आत्मा के रूप में व्याप्त है।
प्रश्न. 4.
कबीर ने अपने को दीवाना’ क्यों कहा है?
उत्तर:
‘दीवाना’ शब्द का अर्थ है-पागल। कबीर स्वयं के लिए इस शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि वे झूठे संसार से दूर प्रभु (परमात्मा) में लीन हैं, भक्ति में सराबोर हैं। उनकी यह स्थिति संसार के लोगों की समझ से परे है, अतः वे स्वयं के लिए इस शब्द का प्रयोग कर रहे हैं।
प्रश्न. 5.
कबीर ने ऐसा क्यों कहा है कि संसार बौरा गया है?
उत्तर:
कबीरदास कहते हैं कि यह संसार बौरा गया है, क्योंकि जो व्यक्ति सच बोलता है, उसे यह मारने को दौड़ता है। उसे सच पर विश्वास नहीं है। कबीरदास तीर्थ स्थान, तीर्थ यात्रा, टोपी पहनना, माला पहनना, तिलक, ध्यान आदि लगाना, मंत्र देना आदि तौर-तरीकों को गलत बताते हैं। वे राम-रहीम की श्रेष्ठता के नाम पर लड़ने वालों को गलत मानते हैं, क्योंकि कबीर की दृष्टि में ईश्वर एक है। वह सहज भक्ति से प्राप्त हो सकता है। इन बातों को सुनकर समाज उनकी निंदा करता है तथा पाखडियों की झूठी बातों पर विश्वास करता है। अत: कबीर को लगता है कि संसार पागल हो गया है।
प्रश्न. 6.
कबीर ने नियम और धर्म का पालन करनेवाले लोगों की किन कमियों की ओर संकेत किया है?
उत्तर:
कबीर के अनुसार स्वयं को नियम और धर्म का पालन करनेवाला माननेवाले लोग आत्मतत्व की सर्वव्यापकता को छोड़कर पत्थरों को पूजते हैं। वे आत्मा की आवाज़ को मारकर पत्थरों में ईश्वर को ढूंढ़ रहे हैं जो उनके भीतर ही विद्यमान है, उसे मारकर बेजान पत्थरों में परमात्मा को खोजना भारी भूल है।
प्रश्न. 7.
अज्ञानी गुरुओं की शरण में जाने पर शिष्यों की क्या गति होती है?
उत्तर:
अज्ञानी गुरुओं की शरण में जाने पर शिष्यों का उपकार नहीं होता अपितु ऐसे गुरु शिष्यों को गलत रास्ते दिखाते हैं। वे घर-घर मंत्र देते फिरते हैं तथा अभिमान में डूबे जाते हैं। अभिमान के कारण ये ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते और दोनों का अंत बुरा होता है।
प्रश्न. 8.
बाह्याडंबरों की अपेक्षा स्वयं (आत्म) को पहचानने की बात किन पंक्तियों में कही गई है? उन्हें अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
पंक्तियाँ-‘आतम मारि पखानहि पूजै, उनमें कछु नहिं ज्ञाना।’
‘साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना।’
कबीर ने उपर्युक्त पंक्तियों में स्वयं (आत्मा) को पहचानने की बात कही है। आत्मा हम सभी के भीतर सजग-सचेत अवस्था है। उसे मारकर बेजान पत्थरों में खोजने की बजाय स्वयं को पहचानना चाहिए। साखियाँ और सबद गाते हुए हमें उसको नहीं भुलाना चाहिए, जो चरम और परम तत्व हमारे भीतर है। सब प्रकार के आडंबरों का त्यागकर स्वयं को पहचानना ही उचित मार्ग है।
पद के आस-पास
प्रश्न. 1.
अन्य संत कवियों नानक, दादू और रैदास आदि के ईश्वर संबंधी विचारों का संग्रह करें और उन पर एक परिचर्चा करें।
उत्तर:
कबीर की भाँति नानक, दादू और रैदास भी निराकार ब्रह्म के उपासक थे। नानक सिक्खों के धर्म गुरु भी थे। अतः उनकी स्चनाएँ गुरुग्रंथ साहब में संकलित हैं। उनके विचार बिलकुल कबीर के समान ही थे –
एक नूर से सब जग उपज्या,
कुदरत दे सब बंदे। – नानक
इसी तरह दादू और रैदास भी ईश्वर को निराकार मानकर मन की शुद्धता पर बल देते हैं
प्रभुजी तुम चंदन हम पानी,
जाकी अंग अंग बास समानी। – रैदास
रैदास मीरा के समकालीन कवि माने जाते हैं। वे भी ब्रह्म को निराकार मानकर मनुष्य से उसका संबंध अभिन्न मानते हैं।
प्रश्न. 2.
कबीर के पदों को शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत दोनों में लयबद्ध भी किया गया है; जैसे-कुमार गंधर्व, भारती बंधु और प्रहलाद सिंह टिपाणिया आदि द्वारा गाए गए पद। इनके कैसेट्स अपने पुस्तकालय के लिए मँगवाएँ और पाठ्यपुस्तक के पदों को भी लयबद्ध करने का प्रयास करें।
उत्तर:
पुस्तकालय के लिए उपर्युक्त कैसेट्स अध्यापक की मदद से मँगवाएँ । संगीत अध्यापक की सहायता से पदों को लयबद्ध किया जा सकता है।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न. 1.
कबीर की दृष्टि में ईश्वर का स्वरूप क्या है?
उत्तर:
कबीर ईश्वर को निराकार मानते हैं। उसे किसी रूप या आकार में नहीं बाँधा जा सकता। वह सर्वव्यापी और घट-घट वासी
प्रश्न. 2.
कबीर अद्वैत सत्ता के समर्थन में क्या-क्या तर्क देते हैं?
उत्तर:
कबीर ईश्वर को एक ही मानते हैं। उसके समर्थन में वे कहते हैं कि संसार के सभी जीव एक ही वायु में श्वास (साँस) लेते हैं। सभी के लिए एक ही जल है और सभी एक ही मिट्टी से बने हैं।
प्रश्न. 3.
अग्नि और काठ के उदाहरण द्वारा कबीर क्या स्पष्ट करना चाहते हैं?
उत्तर:
इस उदाहरण द्वारा कबीर कहना चाहते हैं कि ईश्वर काठ की भाँति आकार स्वरूप (स्थूल) नहीं है। वह आग की भाँति सूक्ष्म, निराकार और सर्वव्यापक है।
प्रश्न. 4.
कबीर संसार के लोगों को निर्भय होकर जीने की सलाह क्यों देते हैं?
उत्तर:
संसारी लोग माया के कारण घमंड से भरे रहते हैं। स्वेच्छा से संसार को त्याग देना सभी मोह-बंधनों को काट देता है। फिर मनुष्य निर्भय हो जाता है। इसलिए कबीर हमें निर्भय होकर जीने की सलाह देते हैं।
प्रश्न. 5.
कबीर की दृष्टि में किस तरह के मनुष्यों को आत्मबोध नहीं हो पाता?
उत्तर:
कबीर कहते हैं कि मनुष्य ईश्वर को बाह्य आडंबरों में खोजता है। वह मंदिरों-मस्जिदों, तप, तीर्थ, तिलक, टोपी धारण करने आदि को ईश्वर प्राप्ति का माध्यम मानता है, जबकि ईश्वर उसके अंदर ही विद्यमान है। उसे वह खोजने की चेष्टा नहीं करता। अभिमानी को आमबोध नहीं हो सकता।
प्रश्न. 6.
मूर्तिपूजा के खंडन में कबीर क्या कहते हैं?
उत्तर:
कबीर इसे झूठा और आडंबरपूर्ण मानते हुए कहते हैं कि आत्मा को मारकर अर्थात् भीतर की आवाज़ न सुनकर पत्थरों को पूजनेवाले अज्ञानी हैं।
प्रश्न. 7.
संक्षेप में बताइए कि कबीर किसी जाति या धर्म का नहीं वरन् आडंबर का विरोध करते थे।
उत्तर:
कबीर ने जहाँ हिंदुओं के कर्म-कांड और मूर्तिपूजा का खंडन किया है वहीं मुसलमानों के पीर, औलिया, किताब-कुरान पढ़नेवालों को भी नहीं छोड़ा। राम-रहमान के नाम पर लड़नेवालों को कबीर भ्रम में भूला हुआ मानते हैं और आत्मा की ताकत को पहचानने की बात कहते हैं।
प्रश्न. 8.
कबीर किन-किन आडंबरों का खंडन करते हैं?
उत्तर:
कबीर ने प्रातः स्नान करना, पत्थर पूजना, कुरान पढ़कर शिष्यों को उपाय बताना, टोपी-टीका लगाना, राम-रहमान के नाम पर झगड़ा करना और अहंकार से भरे रहना, को आडंबर मानकर इनका खंडन किया है।
प्रश्न. 9.
कबीर किसे अधिक महत्त्व देते हैं?
उत्तर:
कबीर के अनुसार संसार मिथ्या है, जो कुछ है हमारे भीतर ही है। वे कहते हैं कि अपनी शक्ति को पहचानो, अपने स्वयं के भीतर की ताकत से परमात्मा तक पहुँचो।
प्रश्न. 10.
कबीर भक्त भी है। समाज सुधारक भी है। – स्पष्ट करें।
उत्तर:
कबीर निर्गुण भक्त परंपरा के कवि हैं वे अद्वैतवाद और निराकार ब्रह्म की उपासना करते थे। उन्होंने सदा बाह्याडंबरों का खंडन किया है व रूढ़ियों का विरोध किया इसलिए उन्हें समाज सुधारक भी कहा जाता है।

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