कवयित्री निर्मला पुतुल का जीवन परिचय-
निर्मला पुतुल जी का जन्म सन 1972 ईस्वी में झारखंड में हुआ था। यह एक आदिवासी परिवार की लड़की थी। इनका बचपन बहुत संघर्षों में गुजरा था।
वैसे तो इनका परिवार शिक्षित था, लेकिन फिर भी इनके परिवार में अकाली की समस्या के कारण इनकी पढ़ाई रुक गई।
निर्मला पुतुल जी ने नर्सिंग में डिप्लोमा किया और इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी से इन्होंने स्नातक की डिग्री भी प्राप्त की।
जब निर्मला जी नर्स की ट्रेनिंग ले रही थी उस दौरान इनका परिचय बाहर की दुनिया से भी हुआ।
इन्होंने आदिवासी समाज के अंदर व्याप्त काफी चीजों को देखा। उनके साथ हो रहे अन्याय एवं अत्याचारों को भी करीब से उन्होंने देखा और महसूस किया।
उन्हीं बातों को उन्होंने अपने कविता के माध्यम से रखने का प्रयास किया है। आदिवासी लोग किस तरीके से अपने जीवन में संघर्ष करते हैं, छोटी-छोटी चीजों से समझौता करते हैं। यह सब कुछ उनकी कविताओं में साफ साफ झलकता है।
इन की प्रमुख रचनाएं-
निर्मला पुतुल जी ने बहुत सारी रचनाएं रची है, जिनमें से प्रमुख है-नगाड़े की तरह बजते शब्द
अपने घर की तलाश में
फूटेग एक नया विद्रोह
एक बार फिर
आदिवासी स्त्रियां आदि।
आओ मिलकर बचाएं कविता का सारांश-
प्रस्तुत कविता आओ मिलकर बचाएं में कवयित्री निर्मला पुतुल जी ने अपनी संस्कृति, अपने झारखंड के सभ्यता को बचाने का आह्वाहन किया है।
शहरी सभ्यता के कारण झारखंड के लोग अपने निजी संस्कृति को भूलते चले जा रहे हैं। जिस कारण कवयित्री निर्मला पुतुल जी अपने झारखंड को फिर से वापस लाने के लिए, लोगों से आग्रह करती हैं कि लोग शहरी सभ्यता की आड़ में ना पले।
झारखंड की संस्कृति में बहुत कुछ व्याप्त है और जब अपनी संस्कृति खूबसूरत हो, तो फिर शहरी संस्कृति को अपनाने की क्या जरूरत है। इन्हीं सब बातों की चर्चा इस संपूर्ण कविता में की गई है।
आओ मिलकर बचाएं कविता-
अपनी बस्तियों को
नंगी होने से
शहर की आबो-हवा से बचाएँ उसे
बचाएँ डूबने से
पूरी की पूरी बस्ती को
हड़िया में
अपने चहरे पर
सन्थाल परगान की माटी का रंग
भाषा में झारखंडी पन
ठंडी होती दिनचर्या में
जीवन की गर्माहट
मन का हरापन
भोलापन दिल का
अक्खड़पन, जुझारूपन भी
भीतर की आग
धनुष की डोरी
तीर का नुकीलापन
कुल्हाड़ी की धार
जंगल की ताज़ा हवा
नदियों की निर्मलता
पहाड़ों का मौन
गीतों का धुन
मिट्टी का सोंधापन
फसलों की लहलहाहट
नाचने के लिए खुला आँगन
गाने के लिए गीत
हँसने के लिए थोड़ी-सी खिलखिलाहट
रोने के लिए मुट्ठी भर एकांत
बच्चों के लिए मैदान
पशुओं के लिए हरी-हरी घास
बूढ़ों के लिए पहाड़ों की शांति
और इस अविश्वास-भरे दौर में
थोड़ा-सा विश्वास
थोड़ी-सी उम्मीद
थोडे-से सपने
आओ, मिलकर बचाएँ
कि इस दौर में भी बचाने को
बहुत कुछ बचा है
अब भी हमारे पास !
अपनी बस्तियों को
नंगी होने से
शहर की आबो-हवा से बचाएँ उसे
बचाएँ डूबने से
पूरी की पूरी बस्ती को
हड़िया में
अपने चहरे पर
सन्थाल परगान की माटी का रंग
भाषा में झारखंडी पन
व्याख्या- प्रस्तुत काव्य पंक्तियां निर्मला पुतुल जी द्वारा रचित है। यह कविता संथाली भाषा का अनुमोदित रूप है। इस कविता में कवयित्री ने अपने परिवेश की संस्कृति को बचाने का प्रयास किया है।
इस कविता में कवयित्री ने शहरी वातावरण का विरोध किया है। उन्हें लगता है कि शहरी वातावरण के कारण उनकी बस्ती का वातावरण बर्बाद हो रहा है। वह अपने बस्ती को शहरी जीवन में परिवर्तित होता हुआ नहीं देख पा रही हैं।
इसलिए वह लोगों का आवाहन करती हैं और कहती हैं कि हम सबको मिलकर हमारी बस्ती को बचाना चाहिए, क्योंकि यदि एक बार हमारी बस्ती को शहर की हवा लग गई, तो हमारी बस्ती पूरी तरीके से बर्बाद हो जाएगी।
शहर के लोग, दूसरे लोगों का शोषण करते हैं और यही शोषण की हवा अगर हमारी बस्ती में लग जाए, तो हमारी बस्ती में भी कुछ नहीं बचेगा। सभी लोग शोषण के शिकार हो जाएंगे। कवयित्री फिर कहती हैं कि हम सबको अपनी संस्कृति को बचाना चाहिए।
हम लोग संथाली लोग हैं और संथाल की मिट्टी, संथाल की भाषा हम सबके चेहरे पर साफ साफ झलकना चाहिए। हम उन शहरों के रंग में नहीं बदलने चाहिए, वरना हमारा अस्तित्व मिट जाएगा।
ठंडी होती दिनचर्या में
जीवन की गर्माहट
मन का हरापन
भोलापन दिल का
अक्खड़पन, जुझारूपन भी
व्याख्या- प्रस्तुत काव्य पंक्तियों में कवयित्री निर्मला पुतुल जी ने यह कहा है कि शहरीकरण के कारण हमारी बस्ती की अवस्था इस कदर हो गई है।
जिस तरीके से शहर के लोग अपने दिनचर्या को सही तरीके से नहीं निभाते हैं। उसी तरीके से हमारी बस्ती के लोग भी नहीं निभा पा रहे हैं। शहरीकरण के कारण हमारे बस्ती के लोगों के जीवन का उल्लास खत्म होता जा रहा है।
उनके मन में जो पहले खुशियां झलकती थी, वह अब समाप्त होती जा रही है। कवयित्री कहती हैं कि लोगों को प्रयास करना चाहिए कि उनके मन में मौजूद जो उत्साह है, उनका अच्छापन का जो भाव है वह खत्म नहीं होना चाहिए।
भीतर की आग
धनुष की डोरी
तीर का नुकीलापन
कुल्हाड़ी की धार
जंगल की ताज़ा हवा
नदियों की निर्मलता
पहाड़ों का मौन
गीतों का धुन
मिट्टी का सोंधापन
फसलों की लहलहाहट
व्याख्या- इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री यह बताना चाहती हैं कि आदिवासी लोगों के जीवन में तीर, धनुष, कुल्हाड़ी इत्यादि का प्रयोग किया जाता है।
फिर कवयित्री कहती हैं कि आदिवासी लोग जंगल, नदी, पर्वत जैसे प्राकृतिक चीजों से जन्म से जुड़े हुए होते हैं।
वह कहती हैं कि मैं नहीं चाहती कि इन प्राकृतिक चीजों से हमारे बस्ती के लोग दूर हो जाए। इसलिए वह चाहती हैं कि बस्ती के लोग शहरीकरण के वातावरण में बिल्कुल भी ना ढ़ले।
नाचने के लिए खुला आँगन
गाने के लिए गीत
हँसने के लिए थोड़ी-सी खिलखिलाहट
रोने के लिए मुट्ठी भर एकांत
बच्चों के लिए मैदान
पशुओं के लिए हरी-हरी घास
बूढ़ों के लिए पहाड़ों की शांति
व्याख्या- प्रस्तुत काव्य पंक्तियों में कवयित्री कहती है कि शहरों में इतनी आबादी बढ़ चुकी है, इतने लोग बढ़ चुके हैं कि वहां पर रहने के लिए घर छोटा होता जा रहा है।
वह कहती हैं यदि नाचने के लिए लोगों को खुला आंगन चाहिए, तो उनको सर्वप्रथम अपने आबादी पर नियंत्रण करना होगा। संथालियों के अपने गीत होते हैं और शहरी लोग फिल्मी गीत से ज्यादा प्रभावित होते हैं।
वह लोगों को अपने गीतों से परिचित करवाना चाहती हैं, फिल्मी गीतों से नहीं। कवयित्री यह भी कहती हैं कि शहर के लोगों में तनाव ज्यादा है क्योंकि वह खुश रहना भूल गए हैं, वह अपने संस्कृति से ऐसा नहीं चाहते हैं।
वह चाहती हैं उनके समाज के लोग खुलकर हंसे और तनाव से बिल्कुल मुक्त रहें।
कवयित्री इसलिए शहरी वातावरण में नहीं ढलना चाहती है, क्योंकि शहर में रहने के लिए घर छोटे होते जा रहे हैं, बच्चों का खेल का मैदान गायब होता जा रहा है, पशुओं के चरने के लिए हरी घास नहीं मिल रही है और उम्र दराज के लोगों को शांत वातावरण नहीं मिल रहा है।
वह अपने समाज को अपनी संस्कृति को बचाना चाहती है और इसके लिए वह सब को आगे आकर एक सामूहिक प्रयास करने के लिए आवाहन करती है।
और इस अविश्वास-भरे दौर में
थोड़ा-सा विश्वास
थोड़ी-सी उम्मीद
थोडे-से सपने
आओ, मिलकर बचाएँ
कि इस दौर में भी बचाने को
बहुत कुछ बचा है
अब भी हमारे पास !
व्याख्या- कविता के इस अंतिम छंद में कवयित्री कहती हैं कि आज संपूर्ण विश्व में एक अविश्वास का वातावरण चल रहा है। इस वातावरण में कोई भी किसी भी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करता है। लेकिन हमें लोगों पर विश्वास करना चाहिए।
यदि हम विश्वास नहीं करेंगे, तो हम जिंदगी में कैसे आगे बढ़ेंगे। हम एक की वजह से 10 लोगों को गलत नहीं समझ सकते हैं। हमें अच्छे कार्य करने होंगे और उस कार्य को करने के लिए लोगों पर थोड़ा सा विश्वास रखना ही होगा।
हमें अपने थोड़े से सपनों को बचाना है, ताकि हम जो अपने अच्छे भविष्य की कल्पना कर रहे हैं, उस कल्पना के अनुसार अपने आप को ढाल सके।
अंततः कवयित्री कहती हैं कि आइए हम सब मिलकर अपने संस्कृति को बचाएं। इस संस्कृति को हम ऐसा बनाएं, जिसे देखकर सभी लोग अचंभित हो जाए और हर एक व्यक्ति हमारे संस्कृति जैसे बनने का प्रयास करें।
आइए हम सब अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति जो हमारी धरोहर है, उसे बचाएं।
प्रश्न 1. माटी का रंग प्रयोग करते हुए किस बात की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर- इस कविता में माटी का हर रंग से अभिप्राय है, अपनी मिट्टी का रंग कवयित्री इस संपूर्ण कविता में यही बताना चाहती हैं कि वह अपने बस्ती के लोगों को शहरी वातावरण के रंग में ढलता हुआ बिल्कुल भी नहीं देख सकती हैं।
इसलिए वह वहां के लोगों से आवाहन करती हैं कि वह शहरी वातावरण में ना ढलकर अपनी संस्कृति में ढले, क्योंकि उनकी संस्कृति में शहरी संस्कृति से ज्यादा अच्छा वातावरण है और वह अपने झारखंड के स्वभाव को भी नष्ट नहीं होने देना चाहती है।
प्रश्न 2. भाषा में झारखंडी पन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर- झारखंडी अर्थात झारखंड की अपनी मातृभाषा। कवयित्री अपनी भाषा को नहीं खोना चाहती हैं, अपनी पहचान को नहीं खोना चाहती हैं।
प्रश्न 3. दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को भी बचाने की आवश्यकता पर बल क्यों दिया गया है?
उत्तर- कवयित्री जानती है कि उनके समाज के लोग बड़े ही साफ दिल के व्यक्तित्व वाले हैं। लेकिन शहरी वातावरण के कारण उनका यह अच्छा पन, भोलापन नष्ट हो सकता है।
इसलिए वह चाहती हैं कि उनके समाज के लोगों के अंदर का वह सरल स्वभाव ना मिटे। उन्हें सही गलत की समझ हो। वह उनकी संघर्षशील स्वभाव से रक्षा करना चाहती हैं, ताकि जीवन की हर कठिन स्थिति में वे लड़ने के लायक बन सके।
प्रश्न 4. प्रस्तुत कविता आदिवासी समाज की किन बुराइयों की ओर संकेत करती है?
उत्तर- इस कविता के माध्यम से कवयित्री ने अपने समाज के लोगों को शहरी वातावरण में जाने से बचने को कहा है। आदिवासी समाज के जिन बुराइयों की ओर उन्होंने संकेत किया है वह कुछ इस प्रकार है–आदिवासी लोग शहरीकरण के कारण अपनी व्यक्तित्व को भूलते जा रहे हैं।
वे लोग अशिक्षित है।
शहरीकरण के कारण संथाली लोग शराबी बनते जा रहे हैं।
संथाली लोगों के अंदर अब आत्मविश्वास की कमी होती जा रही है।
आदिवासियों की पहचान खत्म होती जा रही है।
प्रश्न 5. इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है से क्या आशय है?
उत्तर- कवयित्री ने वर्तमान समाज की ओर संकेत करते हुए कहा है, कि अब वह समाज है, जिस समाज में कोई भी एक दूसरे पर भरोसा नहीं करता है। जिस कारण वह अपनी बर्बादी खुद ही लाते हैं।
हमें कुछ अच्छा करने के लिए लोगों पर विश्वास करना बहुत जरूरी है, क्योंकि जब तक हम विश्वास नहीं करेंगे, तब तक हम जिंदगी में कैसे आगे बढ़ेंगे।
इस तरीके से उन्होंने ना सिर्फ अपनी भाषा को बचाने का प्रयास किया है बल्कि अपने संस्कृति के सभी प्रकार के गुणों के बारे में बता कर अपनी सभ्यता को भी बचाने का भरपूर प्रयास किया है।
प्रश्न 6. निम्नलिखित पंक्तियों के काव्य- सौंदर्य को उद्घाटित कीजिए।
क) ठंडी होती दिनचर्या में जीवन की गर्माहट
उत्तर- इन पंक्तियों का तात्पर्य जीवन की दुख को सुख में परिवर्तित करने के लिए प्रयोग किया गया है। यह काव्य पंक्तियां छंद मुक्त है। भाषा सरल एवं सहज है।
ख) थोड़ा- सा अविश्वास
थोड़ी-सी उम्मीद
थोड़े-से सपने
आओ,मिलकर बचाएं
उत्तर- प्रस्तुत काव्य पंक्तियों की भाषा बहुत ही सहज एवं सुबोध है। एक बेहतर भविष्य की कल्पना करते हुए सभी को एक साथ मिलकर चलने की प्रेरणा दी गई है। यह कविता प्रेरणा का स्रोत है।
प्रश्न 7. बस्तियों को शहर के किस आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है?
उत्तर- शहरी संस्कृति से आदिवासी बस्तियों को बचाने की जरूरत है। शहरी संस्कृति आदिवासियों को मर्यादा से हटा रही है।
शहरीकरण का प्रभाव बस्तियों में इस तरह से बढ़ रहा है जिसे देखकर कवित्री भयभीत हो चुकी है और अब उन्होंने निर्णय किया है कि वह अपनी बस्ती अपने झारखंड को शहरीकरण में परिवर्तित होने से बचा कर ही रहेगी।
इसलिए वह बार-बार इस कविता के माध्यम से लोगों को साथ मिलकर आगे बढ़ने के लिए कह रही है ताकि वह अपनी संस्कृति अपनी झारखंड को बचा सके।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
कविता के साथ
प्रश्न. 1.
माटी का रंग प्रयोग करते हुए किस बात की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर:
कवयित्री ने ‘माटी का रंग’ प्रयोग करके स्थानीय विशेषताओं को उजागर करना चाहा है। संथाल परगने के लोगों में जुझारूपन, अक्खड़ता, नाच-गान, सरलता आदि विशेषताएँ जमीन से जुड़ी हैं। कवयित्री चाहती है कि आधुनिकता के चक्कर में हम अपनी संस्कृति को हीन न समझे। हमें अपनी पहचान बनाए रखनी चाहिए।
प्रश्न, 2.
भाषा में झारखंडीपन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
झारखंडी’ का अभिप्राय है- झारखंड के लोगों की स्वाभाविक बोली। कवयित्री का मानना है कि यहाँ के लोगों को अपनी क्षेत्रीय भाषा को बाहरी भाषा के प्रभाव से मुक्त रखना चाहिए। उसके विशिष्ट उच्चारण व स्वभाव को बनाए रखना चाहिए।
प्रश्न. 3.
दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को भी बचाने की आवश्यकता पर क्यों बल दिया गया है?
उत्तर:
दिल का भोलापन सच्चाई और ईमानदारी के लिए जरूरी है, परंतु हर समय भोलापन ठीक नहीं होता। भोलेपन का फायदा उठाने वालों के साथ अक्खड़पन दिखाना भी जरूरी है। अपनी बात को मनवाने के लिए अकड़ भी होनी चाहिए। साथ ही कर्म करने की प्रवृत्ति भी आवश्यक है। अत: कवयित्री भोलेपन, अक्खड़पन व जुझारूपन-तीनों गुणों को बचाने की आवश्यकता पर बल देती है।
प्रश्न. 4.
प्रस्तुत कविता आदिवासी समाज की किन बुराइयों की ओर संकेत करती है?
उत्तर:
कविता में प्रकृति के विनाश एवं विस्थापन के कठिन दौर के साथ-साथ संथाली समाज की अशिक्षा, कुरीतियों और शराब की ओर बढ़ते झुकाव को भी व्यक्त किया गया है जिसमें पूरी-पूरी बस्तियाँ डूबने जा रही हैं।
प्रश्न. 5.
इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है-से क्या आशय है?
उत्तर:
कवयित्री का कहना है कि आज के विकास के कारण भले ही मानवीय मूल्य उपेक्षित हो गए हों, प्राकृतिक संपदा नष्ट हो रही है, परंतु फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे अपने प्रयत्नों से बचा सकते हैं। लोगों का विश्वास, उनकी टूटती उम्मीदों को जीवित करना, सपनों को पूरा करना आदि ऐसे तत्व हैं, जिन्हें सामूहिक प्रयासों से बचाया जा सकता है।
प्रश्न. 6.
निम्नलिखित पंक्तियों के काव्य-सौंदर्य को उद्घाटित कीजिए:
(क) ठंडी होती दिनचर्या में,
जीवन की गर्माहट
(ख) थोड़ा-सा विश्वास
थोड़ा-सी उम्मीद
थोड़े-से सपने
आओ, मिलकर बचाएँ।
उत्तर:
(क) इस पंक्ति में कवयित्री ने आदिवासी क्षेत्रों में विस्थापन की पीड़ा को व्यक्त किया है। विस्थापन से वहाँ के लोगों की दिनचर्या ठंडी पड़ गई है। हम अपने प्रयासों से उनके जीवन में उत्साह जगा सकते हैं। यह काव्य पंक्ति लाक्षणिक है। इसका अर्थ है-उत्साहहीन जीवन। ‘गर्माहट’ उमंग, उत्साह और क्रियाशीलता का प्रतीक है। इन प्रतीकों से अर्थ गंभीर्य आया है। शांत रस विद्यमान है। अतुकांत अभिव्यक्ति है।
(ख) इस अंश में कवयित्री अपने प्रयासों से लोगों की उम्मीदें, विश्वास व सपनों को जीवित रखना चाहती है। समाज में बढ़ते अविश्वास के कारण व्यक्ति का विकास रुक-सा गया है। वह सभी लोगों से मिलकर प्रयास करने का आहवान करती है। उसका स्वर आशावादी है। ‘थोड़ा-सा’; ‘थोड़ी-सी’ वे ‘थोड़े-से’ तीनों प्रयोग एक ही अर्थ के वाहक है। अतः अनुप्रास अलंकार है। दूर्द (उम्मीद), संस्कृत (विश्वास) तथा तद्भव (सपने) शब्दों को मिला-जुला प्रयोग किया है। तुक, छंद और संगीत विहीन होते हुए कथ्य में आकर्षण है। खड़ी बोली है।
प्रश्न. 7.
बस्तियों को शहर की किस आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है?
उत्तर:
बस्तियों को शहर की नग्नता व जड़ता से बचाने की जरूरत है। स्वभावगत, वेशभूषा व वनस्पति विहीन नग्नता से बचाने का प्रयास सामूहिक तौर पर हो सकता है। शहरी जिंदगी में उमंग, उत्साह व अपनेपन का अभाव होता है। शहर के लोग अलगाव भरी जिंदगी व्यतीत करते हैं।
कविता के आस-पास
प्रश्न. 1.
आप अपने शहर या बस्ती की किन चीज़ों को बचाना चाहेंगे?
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।
प्रश्न. 2.
आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करें।
उत्तर:
आदिवासी समाज आज स्वयं को आधुनिक बनाने के चक्कर में अपनी मौलिकता खो रहा है। स्वयं को पिछड़ा मानकर हीनभाव से ग्रस्त हो वे अपनी धरती की गंध भूलते जा रहे हैं, पर आज भी वहाँ शिक्षा और कुरीतियों के कारण पीढ़ियाँ बिगड़ रही हैं।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न. 1.
शहरी जीवन भाग-दौड़ भरा होने पर भी कवयित्री उसे ठंडी दिनचर्या क्यों मानती हैं?
उत्तर:
शहर में काम की भाग-दौड़ तो बहुत है, पर सामाजिक संबंधों, भावों, प्रेम एवं सौहार्द का अभाव है। आडंबर से भरे शहरी जीवन में गायन-नृत्य, प्रकृति के सान्निध्य का अभाव है। इसी से जीवन दिखावा मात्र है। परस्पर स्नेह के अभाव में गर्माहट नहीं आ सकती। इसीलिए कवयित्री ठंडी होती दिनचर्या को अपनी बस्ती से दूर रखना चाहती है।
प्रश्न, 2.
कविता में वर्णित संथालों के हथियारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कविता में धनुष, तीर, कुल्हाड़ी आदि हथियारों का उल्लेख किया गया है। जब कवयित्री कहती हैं कि हमें धनुष की डोरी, तीर का नुकीलापन और कुल्हाड़ी की धार को बचाना है तो हमें यह अनुभव होता है कि ये पारंपरिक हथियार भी संथालों की पहचान हैं।
प्रश्न. 3.
शहरी प्रभाव के कारण प्राकृतिक वातावरण में क्या परिवर्तन हो रहे हैं?
उत्तर:
शहरी प्रभाव के कारण संथाल बस्तियों में विस्थापन की समस्या आ रही है। जंगल की ताज़ी हवा, नदियों का स्वच्छ जल, पहाड़ों की मौन शांति, मिट्टी की सुगंध, फ़सलों की लहलहाहट, खुले आँगन, मैदान और चरागाह समाप्त होते जा रहे हैं। इससे बच्चे, बूढे और पशु सभी के लिए अभावग्रस्त स्थिति पैदा हो गई है।
प्रश्न. 4.
वर्तमान परिवेश के लिए क्या कहा गया है?
उत्तर:
वर्तमान परिवेश को अविश्वास भरा दौर कहा गया है।
प्रश्न. 5.
आज के दौर में कवयित्री क्या बचाकर या जीवित रखना चाहती है?
उत्तर:
कवयित्री थोड़ी-सी उम्मीद, विश्वास और थोड़े सपने जीवित रखना चाहती है।
प्रश्न. 6.
कविता में किसे बचाने की बात की जा रही है?
उत्तर:
कविता में कहा गया है कि अब भी हमारे पास बचाने के लिए बहुत कुछ बचा है, उसी को बचाने की बात कही जा रही है।
प्रश्न. 7.
बस्ती को ‘बचाएँ डूबने से आशय स्पष्ट करें।
उत्तर:
बस्ती के डूबने का अर्थ है-पारंपरिक रीति-रिवाजों का लोप हो जाना और मौलिकता को खोकर विस्थापन का निरंतर बढ़ना-यह बड़ी चिंता का विषय है। इस प्रकार आदिवासियों की धरोहरे का लुप्त होना डूबने के समान है।
प्रश्न. 8.
संथाल बस्तियों की किन विशेषताओं का ज्ञान आपको कविता के माध्यम से हुआ?
उत्तर:
संथाल बस्तियाँ आदिवासियों की बस्तियाँ हैं। ये लोग अपनी मिट्टी और प्रकृति से जुड़े हुए हैं। इनकी जिंदगी में आडंबर और दिखावे के लिए कहीं भी स्थान नहीं है। ये मन से भोले, अक्खड़ और जुझारू होते हैं। गाना और नाचना इनकी दिनचर्या का अभिन्न अंग है। परस्पर प्रेम और विश्वास इनकी जीवन-शैली है।
प्रश्न, 9.
शहरी प्रभाव में आकर संथाल आदिवासियों में क्या परिवर्तन हो रहे हैं?
उत्तर:
संथाल लोग शहरी संपर्क में आकर अपनी प्रकृति से जुड़ी परंपरा को छोड़ रहे हैं। अपनी भाषा के प्रति उनका लगाव कम हो रहा है और वे भी दिखावे की ओर बढ़ रहे हैं। नाचना-गाना, मन का भोलापन, प्रकृति से लगाव, पहाड़ों का आनंददायक जीवन आदि सभी से वे दूर होते जा रहे हैं।
प्रश्न. 10.
‘आओ मिलकर बचाएँ’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता की रचना संथाल आदिवासी परिवार में जन्मी कवयित्री निर्मला पुतुल दुवारा की गई है। इस कविता में प्रकृति और सामाजिक व्यवस्था को बचाने के लिए प्रयास करने का आह्वान किया गया है। कवयित्री को लगता है कि हम अपनी पारंपरिक भाषा, भावुकता, भोलापन, ग्रामीण संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। प्राकृतिक नदियाँ, पहाड़, मैदान, मिट्टी, फ़सल, हवाएँ आधुनिकता का शिकार हो रही हैं। हमें इन सबको बचाना है। कवयित्री के अनुसार आजकल के परिवेश में बढ़ रहे विकारों को हमें मिटाना है और उसके स्थान पर प्राचीन संस्कारों और प्राकृतिक उपादानों को बचाना है। निराश होने की बात नहीं, अभी हमारे पास बचाने के लिए बहुत कुछ बचा है।
प्रश्न. 11.
आओ, मिलकर बचाएँ’ कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तर:
इस कविता में दोनों पक्षों का यथार्थ चित्रण हुआ है। वृहत्तर संदर्भ में यह कविता समाज में उन चीजों को बचाने की बात करती है जिनका होना स्वस्थ सामाजिक परिवेश के लिए जरूरी है। प्रकृति के विनाश और विस्थापन के कारण आज आदिवासी समाज संकट में है, जो कविता का मूल स्वरूप है। कवयित्री को लगता है कि हम अपनी पारंपरिक भाषा, भावुकता, भोलेपन, ग्रामीण संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। प्राकृतिक नदियाँ, पहाड़, मैदान, मिट्टी, फ़सल, हवाएँ-ये सब आधुनिकता का शिकार हो रही हैं। आज के परिवेश में विकार बढ़ रहे हैं जिन्हें हमें मिटाना है। हमें प्राचीन संस्कारों और प्राकृतिक उपादानों को बचाना है। वह कहती है कि विनाश होने की बात नहीं है क्योंकि अभी भी बचाने के लिए बहुत कुछ बचा है।
प्रश्न. 12.
लेखिका के प्राकृतिक परिवेश में कौन-से सुखद अनुभव हैं?
उत्तर:
लेखिका ने संथाल परगने के प्राकृतिक परिवेश में निम्नलिखित सुखद अनुभव बताए हैं –
जंगल की ताज़ी हवा
नदियों का निर्मल जल
पहाड़ों की शांति
गीतों की मधुर धुनें
मिट्टी की स्वाभाविक सुगंध
लहलहाती फ़सलें।
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