रामनरेश त्रिपाठी का जन्म 4 मार्च 1881 ई को जौनपुर, उत्तर प्रदेश के एक गाँव कोइरीपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम रामदत्त त्रिपाठी था। रामदत्त त्रिपाठी एक परम धार्मिक ब्राह्मण थे। वे भारतीय सेना सूबेदार रह चुके थे।
वे धार्मिक एवं कर्तव्यनिष्ठ थे, राष्ट्रभक्ति उनमें कूट कूट के भरी थी। ये सारे गुण रामनरेश त्रिपाठी को विरासत में मिले थे। वे निर्भीक थे एवं आत्मविश्वास से भरे हुए थे।
उन की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के एक स्कूल में हुई , हाई – स्कूल की पढ़ाई के लिए वे जौनपुर जिले के एक स्कूल में गए पर वो हाई स्कूल की शिक्षा पूरी नहीं कर सके परंतु उन्होने स्वाध्याय से हिन्दी, अँग्रेजी , बंगला एवं उर्दू का ज्ञान प्राप्त किया।
जब वे 18 वर्ष के थे तब पिता से उनकी अनबन हो गयी और वे कलकत्ता चले गए। वे छायावाद पूर्व की खड़ी बोली के एक महान कवि थे। इन्होंने देश-प्रेम एवं प्रेम सम्बन्धों के विषय पर कविताओं की रचना की।
मिलन, पथिक, मानसी, स्वप्न आदि इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। इन्होंने सौराष्ट्र से गुवाहाटी एवं कश्मीर से कन्याकुमारी घूम घूम कर लोक गीतों का चयन किया एवं ‘ग्रामगीत’ की रचना की। कविताओं के अलावा रामनरेश जी ने नाटक, उपन्यास, आलोचना आदि भी लिखी हैं।
वे बाल-साहित्य के जनक माने जाते हैं। उन्होंने कई वर्षों तक ‘बानर’ नामक बाल पत्रिका का सम्पादन किया जिसमें मौलिक कहानियाँ, शिक्षाप्रद कहानियाँ एवं प्रेरक प्रसंग आदि प्रकाशित होती थीं।
‘स्वप्न’ के लिए इन्हें हिदुस्तान अकादमी पुरस्कार भी दिया गया। 16 जनवरी 1962 में प्रयाग में इनकी मृत्यु हो गयी।
प्रस्तुत अंश ‘पथिक’ खंडकाव्य का अंश है। इस काव्यान्श में पथिक अर्थात यात्री की मनोस्थिति एवं प्रकृति के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है। वह दुनिया के दुःखों से विरक्त हो चुका है।
वह प्रकृति के सौन्दर्य पर मुग्ध है और यहीं बसना चाहता है। किसी साधु से संदेश लेकर देशभक्ति का संकल्प लेता है। राजा द्वारा मृत्युदंड मिलने के बाद भी समाज में उसकी कीर्ति बनी रहती है।
सागर के किनारे खड़ा पथिक उसके सौन्दर्य पर मुग्ध हो रहा है। वह बादलों पर बैठ कर विचरण करना चाहता है। लहरों पर बैठकर समुद्र का कोना कोना देखना चाहता है।
समुद्र तल पर सूर्य की किरणों का सौन्दर्य निहार रहा है। वह समुद्र की गर्जना पर मुग्ध हो रहा है। चंद्रमा की रोशनी एवं टिमटिमाते तारों की सुंदरता को देख रहा है।
चहकते हुए पक्षी, महकते हुए फूल, बरसते हुए बादल सब उसे मोहित कर रहे हैं। इस सौन्दर्य को देख कर वह भावुक हो जाता है और आँसू बहाने लगता है। वह इस अद्भुत सौन्दर्य को पाना चाहता है।
इस प्रेम के कारण वह अपनी पत्नी के प्रेम से दूर होता हुआ महसूस कर रहा है। यह रचना स्वच्छंदतावादी है , इसमें प्रेम, भाषा एवं कल्पना का अद्भुत संयोग दिखता है।
प्रतिक्षण नूतन वेश बनाकर रंग-बिरंग निराला।
रवि के सम्मुख थिरक रही हैं नभ में वारिद-माला।
नीचे नील समुद्र मनोहर ऊपर नील गगन है।
घन पर बैठ, बीच में बिचरूं यही चाहता मन है।
रत्नाकर गजन करता है, मलयानिल बहता है।
हरदम यह हौसला हृदय में प्रिये! भरा रहता हैं।
इस विशाल, विस्तृत, महिमामय रत्नाकर के घर के-
कोने-कोने में लहरों पर बैठ फिरू जी भर के।
शब्दार्थ - प्रतिक्षण-हर समय। नूतन-नया। वेश-रूप। रंग-बिरंग-रंगीन। निराला-अनोखा। रवि-सूर्य। सम्मुख-सामने। थिरक-नाच। नभ-आकाश। वारिद-माला-गिरती हुई वर्षा की लड़ियाँ। नील-नीला। मनोहर-सुंदर। गगन-आकाश। घन-बादल। बिचरूं-विचरण करूं। रत्नाकर-समुद्र। मलयानिल-मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित हवा। हौसला-उत्साह। विस्तृत-फैली हुई। महिमामय-महान।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-1 में संकलित कविता ‘पथिक’ से उद्धृत है। इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं। इस कविता में पथिक दुनिया के दुखों से विरक्त होकर प्रकृति के सौंदर्य पर मुग्ध होकर वहीं बसना चाहता है। कवि पथिक के प्रकृति-प्रेम के बारे में बताता है।
पथिक कविता की व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग – 1’ में संकलित कविता ‘पथिक’ से उद्धृत हैं। इनके रचयिता हैं श्री रामनरेश त्रिपाठी जी। इस कविता में पथिक सांसरिक दुःखों से व्यथित है और यहीं प्रकृति की गोद में बस जाना चाहता है।इन पंक्तियों में कविता का नायक पथिक कहता है कि सूर्य के समक्ष बादलों का समूह हर क्षण नए नए एवं रंग-बिरंगे रूप बना कर नृत्य कर रही हैं। नीचे नीला समुद्र है ऊपर नीला आकाश है। यह दृश्य बहुत ही मनोहारी है , नायक इस दृश्य पर मुग्ध है और वह बादलों पर बैठ कर आकाश में विचरण करना चाहता है।
नायक कहता है कि समुद्र गर्जन कर रहा है, पर्वत से आने वाली सुगंधित हवाएँ बह रही हैं। पथिक कहता है कि हे प्रिए यह हौसला मेरे हृदय में भरा रहता है और मैं समुद्र की लहरों पर बैठ कर उसके कोने कोने में जी भर के घूमना चाहता हूँ।
विशेष-
- कवि ने प्रकृति का सुंदर चित्रण किया है।
- बादलों द्वारा नृत्य करने में मानवीकरण अलंकार है।
- अनुप्रास अलंकार की छटा है।
- संस्कृतनिष्ठ शब्दावली युक्त खड़ी बोली है।
- मुक्त छंद है।
- ‘कोने-कोने’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
- संबोधन शैली है।
प्रश्न -1. कवि किस दृश्य पर मुग्ध है?
2. बादलों को देखकर कवि का मन क्या करता है?
3. समुद्र के बारे में कवि क्या कहता है?
4. ‘कोने-कोने ’जी भर के।” पंक्ति का आशय बताइए।
उत्तर-
- कवि सूरज की धूप व बादलों की लुका-छिपी पर मुग्ध है। आकाश भी नीला है तथा मनोहर समुद्र भी नीला और विस्तृत है।
- बादलों को देखकर कवि का मन करता है कि वह बादल पर बैठकर नीले आकाश और समुद्र के मध्य विचरण करे।
- समुद्र के बारे में पथिक के माध्यम से कवि बताता है कि यह रत्नों से भरा हुआ है। यहाँ सुगंधित हवा बह रही है तथा समुद्र गर्जना कर रहा है।
- इसका अर्थ है कि कवि लहरों पर बैठकर महान तथा दूर-दूर तक फैले सागर का कोना-कोना घूमकर उसके अनुपम सौंदर्य को देखना चाहता है।
कमला के कचन-मदिर का मानों कात कैंगूरा।
लाने को निज पुण्य-भूमि पर लक्ष्मी की असवारी।
रत्नाकर ने निर्मित कर दी स्वर्ण-सड़क अति प्यारी।
निर्भय, दृढ़, गभीर भाव से गरज रहा सागर है।
लहरों पर लहरों का आना सुदर, अति सुदर हैं।
कहो यहाँ से बढ़कर सुख क्या पा सकता है प्राणी?
अनुभव करो हृदय से, ह अनुराग-भरी कल्याणी।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-1 में संकलित कविता ‘पथिक’ से उद्धृत है। इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं। इस कविता में पथिक दुनिया के दुखों से विरक्त होकर प्रकृति के सौंदर्य पर मुग्ध होकर वहीं बसना चाहता है। कवि पथिक के प्रकृति-प्रेम के बारे में बताता है।
पथिक कविता की व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग – 1’ में संकलित कविता ‘पथिक’ से उद्धृत हैं। इनके रचयिता हैं श्री रामनरेश त्रिपाठी जी।इस कविता में पथिक सांसरिक दुःखों से व्यथित है और यहीं प्रकृति की गोद में बस जाना चाहता है। इन पंक्तियों में कवि ने पथिक के प्रकृति प्रेम को दर्शाया है।
पथिक कहता है कि सूर्योदय हो रहा है और समुद्र के तल पर सूर्य का आधा बिम्ब दिख रहा है। अर्थात आधा सूर्य समुद्र के अंदर एवं आधा सूर्य समुद्र के ऊपर दिखाई दे रहा है, और वो ऐसा लग रहा है मानो माता लक्ष्मी के स्वर्ण मंदिर का गुंबद हो।
समुद्रतल पर पड़ती हुई सूर्य की रोशनी को देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो लक्ष्मी की सवारी को धरती पर उतारने के लिए स्वयं समुद्र ने प्यारी सी सोने की सड़क बना दी हो।
आगे पथिक कहता है कि समुद्र अत्यंत निडर, गंभीर एवं मजबूत भाव से गर्जना कर रहा है। लहरों के ऊपर लहरें आ रही हैं जो कि अत्यंत सुंदर दिख रही हैं।
पथिक इन सब को देख कर मुग्ध हुआ जा रहा है और अपनी प्रिया को संबोधित करते हुए कहता है कि तुम इस सौन्दर्य को अपने हृदय से अनुभव करो और बताओ कि कोई भी प्राणी इससे ज्यादा सुख और कहाँ पा सकता है।
विशेष-
- कवि ने सूर्योदय का अद्भुत वर्णन किया है; जैसे-स्वर्णमार्ग की कल्पना।
- कवि प्रकृति-सौंदर्य व प्रिया-प्रेम में प्रकृति को सुंदर मानता है।
- कमला ….. कँगूरा’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
- अनुप्रास अलंकार की छटा है।
- संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है।
- मुक्त छद है।
- प्रश्न अलंकार है।
- भाषा प्रवाहमयी है।
प्रश्न -1. सूर्योदय देखकर कवि को क्या लगता है?
2. सागर के विषय में पथिक क्या बताता है?
3. पथिक अपनी प्रिया को कैसे संबोधित करता है तथा उसे क्या बताना चाहता है?
4. ‘कमला का कचन-मंदिर’ किसे कहा गया है?
उत्तर-
- सूर्योदय का दृश्य देखकर कवि को लगता है कि समुद्र तल पर सूर्य का बिंब अधूरा निकल रहा है अर्थात् आधा सूर्य जल के अंदर है तथा आधा बाहर, मानो यह लक्ष्मी देवी के स्वर्ण-मंदिर का चमकता हुआ कैंगूरा हो।
- सागर के विषय में पथिक बताता है कि वह निर्भय होकर मजबूती के साथ गंभीर भाव से गरज रहा है, उस पर लहरों का आना-जाना बहुत सुंदर लगता है।
- पथिक ने अपनी प्रिया को ‘अनुराग भरी कल्याणी’ कहकर संबोधित किया है। वह उसे बताना चाहता है कि प्रकृति-सौंदर्य असीम है। उसका कोई मुकाबला नहीं है।
- कमला का कंचन-मंदिर उदय होते सूर्य का छोटा-अंश है। यह कवि की नूतन कल्पना है। लक्ष्मी का निवास सागर ही है जहाँ से सूरज निकल रहा है।
जब गभीर तम अद्ध-निशा में जग को ढक लता है।
अतरिक्ष की छत पर तारों को छिटका देता हैं।
सस्मित-वदन जगत का स्वामी मृदु गति से आता है।
तट पर खड़ा गगन-गगा के मधुर गीत गाता है।
उसमें ही विमुग्ध हो नभ में चद्र विहस देता है।
वृक्ष विविध पत्तों-पुष्पों से तन को सज लेता है।
पक्षी हर्ष सभाल न सकतें मुग्ध चहक उठते हैं।
फूल साँस लेकर सुख की सनद महक उठते हैं-
शब्दार्थ - गंभीर-गहरा। तम-अँधेरा। अर्द्ध-आधी। निशा-रात्री। जग-संसार। अंतरिक्ष-धरती की सीमा से परे। सस्मित-मुसकराता हुआ। बदन-मुख। जगत-संसार। मृदु-कोमल। गगन-आकाश। विमुग्ध-प्रसन्न। नभ-आकाश। चंद्र-चाँद। विहँस-हँसना। वृक्ष-पेड़। विविध-कई तरह के। पुष्प-फूल। तन-शरीर। हर्ष-खुशी। मुग्ध-प्रसन्न। सानंद-आनंद सहित।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-1 में संकलित कविता ‘पथिक’ से उद्धृत है। इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं। इस कविता में पथिक दुनिया के दुखों से विरक्त होकर प्रकृति के सौंदर्य पर मुग्ध होकर वहीं बसना चाहता है। कवि पथिक के प्रकृति-प्रेम के बारे में बताता है।
इस कविता में पथिक सांसरिक दुःखों से व्यथित है और यहीं प्रकृति की गोद में बस जाना चाहता है। इन पंक्तियों में कवि ने पथिक के प्रकृति प्रेम का वर्णन किया है।
पथिक कहता है कि जब आधी रात हो जाती है तब गहरा अंधेरा समस्त संसार को ढक लेता है और अन्तरिक्ष रूपी छत पर तारे बिखरा देता है । तब धीमी गति से संसार का स्वामी मुस्कुराते हुए आता है और समुद्र के तट पर खड़े होकर आकाशगंगा के मीठे मीठे गीत गाता है।
ये सब देख सुन कर आकाश में चन्द्रमा भी मुग्ध होकर हंस देता है। वृक्ष भी विभिन्न प्रकार के फूल – पत्तियों से खुद को सजा लेता है । पक्षी भी अपनी भावनाओं को संभाल नहीं पाते हैं एवं मुग्ध होकर चहक उठते हैं। पुष्प भी सांस लेने लगते हैं और सुख से महकने लगते हैं।
विशेष-
- प्रकृति का मनोहारी चित्रण है।
- प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।
- कवि की कल्पना अद्भुत है।
- संस्कृतनिष्ठ शब्दावली युक्त खड़ी बोली है।
- मुक्त छद है।
- अनुप्रास अलंकार की छटा है।
- प्रसाद गुण है।
- अर्द्धरात्रि का सौदर्य बताइए।
- संसार का स्वामी क्या कार्य करता है?
- चंद्रमा के हँसने का क्या कारण है? “
- वृक्षों व पक्षियों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
- अद्र्धरात्रि में संसार पर गहरा अंधकार छा जाता है। ऐसे समय में आकाश की छत पर तारे टिमटिमाने लगते हैं। आकाश गंगा को निहारने के लिए संसार का स्वामी गुनगुनाता है।
- संसार का स्वामी मुसकराते हुए धीमी गति से आता है तथा तट पर खड़ा होकर आकाश-गंगा के लिए मधुर गीत गाता है।
- संसार का स्वामी आकाश-गंगा के लिए गीत गाता है। उस प्रक्रिया को देखकर चंद्रमा हँसने लगता है।
- रात में आकाश-गंगा के सौंदर्य, चंद्रमा के हँसने, जगत-स्वामी के गीतों से वृक्ष व पक्षी भी प्रसन्न हो जाते हैं। वृक्ष अपने शरीर को पत्तों व फूलों से सजा लेता है तथा पक्षी चहकने लगते हैं।
वन, उपवन, गिरि, सानु, कुंज में मेघ बरस पड़ते हैं।
मेरा आत्म-प्रलय होता हैं, नयन नीर झड़ते हैं।
पढ़ो लहर, तट, तृण, तरु, गिरि, नभ, किरन, जलद पर प्यारी।
लिखी हुई यह मधुर कहानी विश्व-विमोहनहरी।।
कैसी मधुर मनोहर उज्ज्वल हैं यह प्रेम-कहानी।
जी में हैं अक्षर बन इसके बनूँ विश्व की बानी।
स्थिर, पवित्र, आनद-प्रवाहित, सदा शांति सुखकर हैं।
अहा! प्रेम का राज्य परम सुदर, अतिशय सुदर हैं।।
शब्दार्थ - वन-जंगल। उपवन-बाग। गिरि-पहाड़। सानु-समतल भूमि। कुंज-वनस्पतियों का झुरमुट मेघ-बादल। आत्म-प्रलय-मन का फूट पड़ना। नयन-आँख। नीर-पानी। झड़ना-निकला। तट-किनारा। तृण-घास। तरु-पेड़। नभ-आकाश। जलद-बादल। विश्व-विमोहनहारी-संसार को मुग्ध करने वाली। मनोहर-सुंदर। उज्ज्वल-उजली। जी-दिल। बानी-वाणी। स्थिर-ठहरा हुआ। आनंद-प्रवाहित-आनंद से बहने वाली धारा। सुखकर-सुखदायी। परम-अत्यधिक अतिशय-अत्यधिक।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-1 में संकलित कविता ‘पथिक’ से उद्धृत है। इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं। इस कविता में पथिक दुनिया के दुखों से विरक्त है और प्रकृति के सौंदर्य पर मुग्ध होकर वहीं बसना चाहता है, कवि पथिक के प्रकृति-प्रेम के बारे में बताता है।
इस कविता में पथिक सांसरिक दुःखों से व्यथित है और यहीं प्रकृति की गोद में बस जाना चाहता है। इन पंक्तियों में कवि ने पथिक के प्रकृति प्रेम का वर्णन किया है।
पथिक कहता है कि प्रकृति की प्रेम लीला से जंगल, बगीचे, पर्वत, समुद्रतल, वनस्पति सब पर बादल बरसने लगते हैं। इन दृश्यों को देखकर पथिक का मन भावुक हो उठता है और उसकी आँखों से आँसू गिरने लगते हैं।
वह अपनी प्रिय को संबोधित करते हुए कहता है कि इस मीठी कहानी को पढ़ो जो कि प्रकृति ने लहरों, समुद्रतट, पेड़ों, तिनकों, पर्वत, आकाश, बादल, सूर्यप्रकाश पर लिखी हैं।
पथिक कहता है कि यह प्रेम- कहानी कितनी प्यारी एवं उज्ज्वल है, मेरा मन करता है कि मैं इस प्रेम-कथा का एक अक्षर बन जाऊँ और विश्व की आवाज़ बनूँ ।
यह दृश्य कितना स्थिर है पवित्र है शान्तिदायक है सुखदायक है। प्रकृति के इस दृश्य में आनंद का प्रवाह होता है। यह प्रेम का राज्य है और यह अत्यंत सुंदर है।
विशेष-
- प्रकृति-प्रेम का उत्कट रूप है।
- प्रश्न, आश्चर्यबोधक व भावबोधक शैली है।
- प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।
- संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है।
- मुक्त छंद है।
- अनुप्रास अलंकार की छटा है।
- आँसुओं के लिए ‘नयन-नीर’ सुंदर प्रयोग है।
- ‘सुंदर’ के साथ दो विशेषण-परम व अतिशय बहुत प्रभावी हैं।
प्रश्न
- कवि कब भाव-विभोर हो जाता है?
- कवि अपनी प्रेयसी से क्या अपेक्षा रखता है?
- प्रकृति के लिए कवि ने किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया है?
- कवि किसे प्रेम का राज्य कह रहा है? उसकी क्या विशेषता है?
उत्तर-
- वन, उपवन, पर्वत आदि सभी पर बरसते बादलों को देखकर कवि भाव-विभोर हो जाता है। फलस्वरूप उसकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
- कवि अपनी प्रेयसी से अपेक्षा रखता है कि वह लहर, तट, तिनका, पेड, पर्वत, आकाश, किरण व बादलों पर लिखी हुई प्यारी कहानी को पढ़े और उनसे कुछ सीखे।
- प्रकृति के लिए कवि ने ‘स्थिर, पवित्र, आनंद-प्रवाहित’ तथा ‘सदा शांति सुखकर’ विशेषणों का प्रयोग किया है।
- कवि प्रकृति के असीम सौंदर्य को प्रेम का राज्य कह रहा है। यह प्रेम-राज्य स्थिर, पवित्र शांतिमय, सुंदर व सुखद है।
कविता के साथ
प्रश्न 1:
पथिक का मन कहाँ विचरना चाहता है?
उत्तर-
पथिक का मन बादल पर बैठकर नीलगगन में घूमना चाहता है और समुद्र की लहरों पर बैठकर सागर का कोना-कोना देखना चाहता है।
प्रश्न 2:
सूर्योदय वर्णन के लिए किस तरह के बिंबों का प्रयोग हुआ है?
उत्तर-
सूर्योदय वर्णन के लिए कवि ने निम्नलिखित बिंबों का प्रयोग किया है-
(क) समुद्र तल से उगते हुए सूर्य का अधूरा बिंब अर्थात् गोला अपनी प्रात:कालीन लाल आभा के कारण बहुत ही मनोहर दिखता है।
(ख) वह सूर्योदय के तट पर दिखने वाले आधे सूर्य को कमला के स्वर्ण-मंदिर का कैंगूरा बताता है।
(ग) दूसरे बिंब में वह इसे लक्ष्मी की सवारी के लिए समुद्र द्वारा बनाई स्वर्ण-सड़क बताता है।
प्रश्न 3:
आशय स्पष्ट करें-
(क) सस्मित-वदन जगत का स्वामी मृदु गति से आता है। तट पर खड़ा गगन-गगा के मधुर गीत गाता है।
(ख) कैसी मधुर मनोहर उज्ज्वल हैं यह प्रेम कहानी। जी में हैं अक्षर बन इसके बनूँ विश्व की बानी।
उत्तर-
(क) इन पंक्तियों में कवि रात्रि के सौंदर्य का वर्णन करता है। वह बताता है कि संसार का स्वामी मुस्कराते हुए धीमी गति से आता है तथा तट पर खड़ा होकर आकाश-गंगा के मधुर गीत गाता है।
(ख) कवि कहता है कि प्रकृति के सौंदर्य की प्रेम-कहानी को लहर, तट, तिनके, पेड़, पर्वत, आकाश, और किरण पर लिखा हुआ अनुभव किया जा सकता है। कवि की इच्छा है कि वह मन को हरने वाली उज्ज्वल प्रेम कहानी का अक्षर बने और संसार की वाणी बने। वह प्रकृति का अभिन्न हिस्सा बनना चाहता है।
प्रश्न 4:
कविता में कई स्थानों पर प्रकृति को मनुष्य के रूप में देखा गया है। ऐसे उदाहरणों का भाव स्पष्ट करते हुए लिखें।
उत्तर-
कवि ने अनेक स्थलों पर प्रकृति का मानवीकरण किया है जो निम्नलिखित हैं-
(क) प्रतिक्षण नूतन वेश बनाकर रंग-बिरंग निराला।
रवि के सम्मुख थिरक रही है। नभ में वारिद-माला।
भाव-यहाँ कवि ने सूर्य के सामने बादलों को रंग-बिरंगी वेशभूषा में थिरकती नर्तकी रूप में दर्शाया है।
वे सूर्य को प्रसन्न करने के लिए नए-नए रूप बनाते हैं।
(ख) रत्नाकर गर्जन करता है-
भाव-समुद्र के गर्जन की बात कही है। वह गर्जना ऐसी प्रतीत होती है मानो कोई वीरं अपनी वीरता का हुकार भर रहा हो।
(ग) लाने को निज पुण्य भूमि पर लक्ष्मी की असवारी।
रत्नाकर ने निमित कर दी स्वण-सड़क अति प्यारी।
भाव-कवि को सूर्य की किरणों की लालिमा समुद्र पर सोने की सड़क के समान दिखाई देती है, जिसे समुद्र ने लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए तैयार किया है। यह आतिथ्य भाव को दर्शाता है।
(घ) जब गभीर तम अद्ध-निशा में जग को ढक लता हैं।
अंतरिक्ष की छत पर तारों को छिटका देता है।
भाव-इस अंश में अंधकार द्वारा सारे संसार को ढकने तथा आकाश में तारे छिटकाने का वर्णन है। इसमें प्रकृति को चित्रकार के रूप में दर्शाया गया है।
(ड) सस्मित-वदन जगत का स्वामी मृदु गति से आता है।
तट पर खड़ा गगन-गगा के मधुर गीत गाता है।
भाव-इस अंश में ईश्वर को मानवीय रूप में दर्शाया है। वह मुस्कराते हुए आकाश-गंगा के गीत गाता है।
(च) उससे ही विमुग्ध हो नभ में चद्र विहस देता है।
वृक्ष विविध पत्तों-पुष्पों से तन को सज लेता है।
फूल साँस लेकर सुख की सनद महक उठते हैं—
भाव-इसमें चंद्रमा को प्रकृति की प्रेम-लीला पर हँसते हुए दिखाया गया है। मधुर संगीत व अद्भुत सौंदर्य पर मुग्ध होकर चंद्रमा भी मानव की तरह हँसने लगता है। वृक्ष भी मानव की तरह स्वयं को सजाते हैं तथा प्रसन्नता प्रकट करते हैं। फूल द्वारा सुख की साँस लेने की प्रक्रिया मानव की तरह मिलती है।
कविता के आस-पास
प्रश्न 1:
समुद्र को देखकर आपके मन में क्या भाव उठते हैं? लगभग 200 शब्दों में लिखें।
उत्तर-
समुद्र अथाह जलराशि का स्रोत है। उसमें तरह-तरह के जीव-जंतु पाए जाते हैं। वह स्वयं में रहस्य है तथा इसी कारण आकर्षण का बिंदु है। मेरे मन में बचपन से ही उत्कंठा रही है कि सागर को समीप से देखें। उसके पास जाकर देखें कि पानी की विशाल मात्रा को यह कैसे नियत्रित करता है? इसमें किस-किस तरह की वनस्पतियाँ तथा जीव हैं? लहरें किस तरह आती-जाती हैं?
समुद्र पर सूर्योदय व सूर्यास्त का दृश्य सबसे अद्भुत होता है। सुबह लाल सूर्य धीरे-धीरे ऊपर उठता है और समुद्र के पानी का रंग धीरे-धीरे बदलता रहता है। पहले वह लाल होता है फिर वह नीले रंग में बदल जाता है। शाम के समय समुद्र की लहरों का अपना आकर्षण है। लहरें एक के बाद एक आती हैं। ये जीवन की परिचायक हैं। समुद्र की गर्जना भी सुनाई देती है। शांत समुद्र मन को भाता है। चाँदनी रात में लहरें मादक सौंदर्य प्रस्तुत करती हैं।
प्रश्न 2:
प्रेम सत्य है, सुंदर है-प्रेम के विभिन्न रूपों को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर परिचर्चा करें।
उत्तर-
यह सही है कि प्रेम सत्य है और सुंदर है। यह अनुभूति हमें ईश्वर का बोध कराती है। प्रेम के अनेक रूप होते हैं-
● मौ का प्रेम
● देश–प्रेम
● प्रेयसी-प्रेम
● मानव-प्रेम
● सहचरणी-प्रेम
● प्रकृति–प्रेम
● बाल-प्रेम
उपर्युक्त बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थी स्वयं परिचर्चा आयोजित करें।
प्रश्न 3:
वर्तमान समय में हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं इस पर चर्चा करें और लिखें कि प्रकृति से जुड़े रहने के लिए क्या कर सकते हैं?
उत्तर-
यह सही है कि वर्तमान समय में हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। आज अपनी सुविधाओं के लिए हम जंगलों को काटकर कंक्रीट के नगर-महानगर बसाते जा रहे हैं। रोजगार के लिए चारों तरफ से लोग यहाँ आकर छोटे-छोटे घरों में रहते हैं। यहाँ रहने वाला व्यक्ति कभी प्रकृति के संपर्क में नहीं रह सकता। उन्हें धूप, छाया, वर्षा, ठंड आदि का आनंद नहीं मिलता। वे लोग गमलों में प्रकृति-प्रेम को दर्शा लेते हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। प्रकृति से जुड़े रहने के लिए हम निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं
- हम कोशिश करें कि मनुष्यों के आवास स्थान पर खुला पार्क हो।
- सार्वजनिक कार्यक्रम प्राकृतिक स्थलों के समीप आयोजित किए जाएँ।
- हर घर में वृक्ष अवश्य हों।
- स्कूलों एवं अन्य संस्थाओं में पौधे लगवाने चाहिए।
- सड़क के दोनों किनारों पर काफी संख्या में वृक्ष लगाएँ।
- महीने में कम-से-कम एक बार नजदीक जगल, नदी, पर्वत या पठार पर जाना चाहिए।
प्रश्न 4:
सागर संबंधी दस कविताओं का संकलन करें और पोस्टर बनाएँ।
उत्तर-
विद्याथी स्वयं करें।
अन्य हल प्रश्न
● लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1:
‘पथिक” कविता का प्रतिपादय लिखें।
उत्तर-
‘पथिक’ कविता में दुनिया के दुखों से विरक्त काव्य नायक पथिक की प्रकृति के सौंदर्य पर मुग्ध होकर वहीं बसने की इच्छा का वर्णन किया है। यहाँ वह किसी साधु द्वारा संदेश ग्रहण करके देशसेवा का व्रत लेता है। राजा उसे मृत्युदंड देता है, परंतु उसकी कीर्ति समाज में बनी रहती है।
सागर के किनारे खड़ा पथिक, उसके सौंदर्य पर मुग्ध है। प्रकृति के इस अद्भुत सौंदर्य को वह मधुर मनोहर उज्ज्वल प्रेम कहानी की तरह पाना चाहता है। प्रकृति के प्रति पथिक का यह प्रेम उसे अपनी पत्नी के प्रेम से दूर ले जाता है। इस रचना में प्रेम, भाषा व कल्पना का अद्भुत संयोग मिलता है।
प्रश्न 2:
किन-किन पर मधुर प्रेम-कहानी लिखी प्रतीत होती है?
उत्तर-
समुद्र के तटों, पर्ततों, पेड़ों, तिनकों, किरणों, लहरों आदि पर यह मधुर प्रेम-कहानी लिखी प्रतीत होती है।
प्रश्न 3:
‘अहा! प्रेम का राज परम सुंदर, अतिशय सुंदर है।’-भाव स्पष्ट करें।
उत्तर-
कवि प्रकृति के सुंदर रूप पर मोहित है। उसके सौंदर्य से अभिभूत होकर उसे सबसे अधिक सुंदर राज्य कहकर अपने आनंद को अभिव्यक्त कर रहा है।
प्रश्न 4:
सूर्योदय के समय समुद्र के दृश्य का कवि ने किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर-
पथिक के माध्यम से सूर्योदय का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि इस समय समुद्र की सतह से सूर्य का बिंब अधूरा निकल रहा है अर्थात् आधा सूर्य जल के अंदर है तथा आधा बाहर। ऐसा लगता है मानो यह लक्ष्मी देवी के स्वर्ण-मंदिर का चमकता हुआ कैंगूरा हो। पथिक को लगता है कि समुद्र ने अपनी पुण्य-भूमि पर लक्ष्मी की सवारी लाने के लिए अति प्यारी सोने की सड़क बना दी हो। सुबह सूर्य का प्रकाश समुद्र तल पर सुनहरी सड़क का दृश्य प्रस्तुत करता है।

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