सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय –
सुमित्रानंदन पंत छायावाद के प्रमुख कवि हैं। हिन्दी कविता में प्रकृति के विषय पर कविता लेखन की शुरुआत इन्होंने ही की थी। इनका जन्म 20 मई 1900 ई को उत्तराखंड के कौसानी में हुआ था। जन्म के कुछ ही घंटों के पश्चात उनकी माँ का देहांत हो गया था।
इसलिए उनका पालन पोषण उनकी दादी ने किया था और उनका नाम ‘गुसाईं दत्त’ रखा था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा कौसानी के ही एक विद्यालय में हुई थी। हाईस्कूल की पढ़ाई के लिये वे वाराणसी चले गए और वहाँ के जयनारायण हाईस्कूल में उन्होंने शिक्षा ग्रहण की।
इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद के म्योर सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लिया परंतु बीच में ही पढ़ाई छोड़ कर असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। उनका बचपन प्रकृति की गोद में बीता था।
हिमालय के शिखर, पक्षियों का कलरव, चीड़ के पेड़ एवं कत्यूर घाटी और इनके साथ साथ दादी की कहानियाँ ये सब ही उनके बचपन के साथी थे। प्रकृति की छांव का ही असर था कि वे बचपन से ही कवि हृदय के थे।
उनके भाई को हिन्दी, अँग्रेजी, संस्कृत एवं कुमाऊँनी भाषाओं की अच्छी जानकारी थी और कविताएं लिखने का भी शौक था। सुमित्रानंदन उनको देखते एवं उनकी ही तरह कविता लिखने का प्रयास भी करते।
जब वो हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा गए तब शहरी सभ्यता से बहुत प्रभावित हुए। सबसे पहले उन्होंने अपना नाम बदला। वे लक्ष्मण के चरित्र को आदर्श मानते थे इसलिए उन्होंने अपना नाम गुसाईं से बदल कर ‘सुमित्रानंदन’ कर लिया।
वे नेपोलियन के युवावस्था के चित्र से प्रभावित हुए और उन्होंने अपने बाल लंबे एवं घुँघराले रख लिए। आगे चलकर उन्हें अपने लेखन के लिए कई पुरस्कार एवं उपाधियाँ दी गईं।
कविताओं के अलावा उन्होंने नाटक, कहानी, आत्मकथा, उपन्यास, आलोचना आदि के क्षेत्रों में भी काम किया है। उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक पत्रिका का सम्पादन भी किया जिसका विषय था प्रगतिवाद। वीणा, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन, युगवाणी, चिदम्बरा, स्वर्ण किरण, कला, बूढ़ा चाँद आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
अपने जीवन काल में उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार एवं पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। सन 1977 ई में इलाहाबाद में उनकी मृत्यु हो गयी।
वे आँखें कविता का सारांश –
प्रस्तुत कविता हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग -1‘ से ली गयी है। इसके कवि हैं सुमित्रानंदन पंत। यह एक प्रगतिशील दौर की कविता है। इस कविता में कवि ने विकास के विरोधाभास पर प्रहार किया है।
समाज में किसानों की स्थिति बहुत ही दयनीय है और यह बात कवि को बहुत आहत करती है। वह उनके शोषण को देख कर बहुत दुःखी हैं और युगों से किसानों की स्थिति ऐसी ही बनी हुई है इससे कवि को बहुत पीड़ा होती है।
भारत के स्वाधीन होने के बाद भी किसानों की सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। उनको ध्यान में रखते हुए कोई भी उचित निर्णय नहीं लिया गया है।भारत एक कृषि प्रधान देश होने के बाद भी किसानों की स्थिति समाज में शोषित वर्ग के रूप में जानी जाती है।
इस कविता में कवि ने किसानों के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक समस्याओं को उजागर किया है। कवि ने बहुत ही व्यापक रूप से समाज में व्याप्त वर्ग व्यवस्था को दर्शाया है।
उन्होंने बताया है कि किस प्रकार समाज आर्थिक स्तर पर उच्च वर्ग , मध्यम वर्ग , निम्न वर्ग में बंटा हुआ है। जाति के आधार पर बंटा हुआ है। वर्गीय चेतना अभी भी व्याप्त है और समाज विभिन्न वर्गों में बंटा हुआ है।
वे आँखें कविता-
अंधकार की गुहा सरीखी
उन आँखों से डरता है मन,
भरा दूर तक उनमें दारुण
दैन्य दुख का नीरव रोदन
वह स्वाधीन किसान रहा,
अभिमान भरा आँखों में इसका,
छोड़ उसे मँझधार आज
संसार कगार सदृश बह खिसका!
लहराते वे खेत दृगों में
हुया बेदख़ल वह अब जिनसे,
हँसती थी उनके जीवन की
हरियाली जिनके तृन तृन से!
आँखों ही में घूमा करता
वह उसकी आँखों का तारा,
कारकुनों की लाठी से जो
गया जवानी ही में मारा!
बिका दिया घर द्वार,
महाजन ने न ब्याज की कौड़ी छोड़ी,
रह रह आँखों में चुभती वह
कुर्क हुई बरधों की जोड़ी!
उजरी उसके सिवा किसे कब
पास दुहाने आने देती?
अह, आँखों में नाचा करती
उजड़ गई जो सुख की खेती!
बिना दवा दर्पन के घरनी
स्वरग चली,–आँखें आतीं भर,
देख रेख के बिना दुधमुँही
बिटिया दो दिन बाद गई मर!
घर में विधवा रही पतोहू,
लछमी थी, यद्यपि पति घातिन,
पकड़ मँगाया कोतवाल नें,
डूब कुँए में मरी एक दिन!
ख़ैर, पैर की जूती, जोरू
न सही एक, दूसरी आती,
पर जवान लड़के की सुध कर
साँप लोटते, फटती छाती!
पिछले सुख की स्मृति आँखों में
क्षण भर एक चमक है लाती,
तुरत शून्य में गड़ वह चितवन
तीखी नोक सदृश बन जाती।
अंधकार की गुहा सरीखी
उन आँखों से डरता है मन,
भरा दूर तक उनमें दारुण
दैन्य दुख का नीरव रोदन
अभिमान भरा आँखों में इसका,
छोड़ उसे मँझधार आज
संसार कगार सदृश बह खिसका!
व्याख्या: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-1‘ में संकलित कविता ‘वे आँखें’ से उद्धृत हैं। इसके कवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इस कविता में किसानों के शोषण एवं शोषक का वर्णन किया गया है।
स्वतंत्र भारत में भी किसानों की स्थिति दुःखदायक एवं निराशाजनक है। यह देख कर कवि दुःखी है।
कवि कहता है कि किसान की आँखें किसी अंधेरी गुफा के समान प्रतीत होती हैं , उन आँखों को देख कर मन में भय उत्पन्न होने लगता है। उन आँखों में दूर दूर तक घोर दुःख और पीड़ा के आँसू दिखाई देते हैं।
पहले वह स्वतंत्र था , उसकी आँखों में गर्व भरा होता था। परंतु आज वह अत्यंत दुःखी है और इस दुःख के समय में संसार ने उसे समस्याओं के मँझधार में छोड़ दिया है और उससे किनारा कर लिया है।
लहराते वे खेत दृगों में
हुया बेदख़ल वह अब जिनसे,
हँसती थी उनके जीवन की
हरियाली जिनके तृन तृन से!
आँखों ही में घूमा करता
वह उसकी आँखों का तारा,
कारकुनों की लाठी से जो
गया जवानी ही में मारा!
व्याख्या: इन पंक्तियों में किसान अपने पुराने दिनों को याद कर रहा है। पहले उसके पास उसके अपने खेत हुआ करते थे । जो फसल से भरे लहलहाते रहते थे। वह दृश्य किसान की आँखों के आगे घूम रहा है।
अब उसे उसकी खुद की जमीन से बेदखल कर दिया गया है। जमींदारों ने उसकी ज़मीन हड़प ली है। कभी उस ज़मीन और उसके तिनके तिनके से किसान का परिवार फलता फूलता था उनका जीवन सुखी था ।
किसान की आँखों के आगे वह दृश्य घूम जाता है जब उसके प्यारे बेटे को जमींदार के कारिंदों ने लाठियों से मार डाला था। जवानी में ही उसका बेटा दुनिया छोड़ गया।
बिका दिया घर द्वार,
महाजन ने न ब्याज की कौड़ी छोड़ी,
रह रह आँखों में चुभती वह
कुर्क हुई बरधों की जोड़ी!
उजरी उसके सिवा किसे कब
पास दुहाने आने देती?
अह, आँखों में नाचा करती
उजड़ गई जो सुख की खेती!
व्याख्या: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-1‘ में संकलित कविता ‘वे आँखें’ से उद्धृत हैं। इसके कवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इस कविता में किसानों के शोषण एवं शोषक का वर्णन किया गया है।
स्वतंत्र भारत में भी किसानों की स्थिति दुःखदायक एवं निराशाजनक है। यह देख कर कवि दुःखी है।
इन पंक्तियों में किसान की मन की व्यथा का वर्णन किया गया है। वह कर्ज़ में पूरी तरह डूब गया था । जब कर्ज़ उतारने के लिए पैसे नहीं बचे तब महाजन ने उसकी सारी संपत्ति को नीलाम कर दिया ।
उसका घर खेत सबकुछ बिक गया। महाजन ने ब्याज का एक पैसा भी बकाया नहीं छोड़ा। उसके बैल के जोड़े को भी उससे छीन लिया। वह दृश्य उसकी आँखों में हर समय चुभता रहता है।
किसान के पास एक सफ़ेद गाय भी थी जिसे वह प्यार से उजरी कहता था। उजरी उसके अलावा किसी को भी अपने पास दूध दुहने आने नहीं देती थी। कितना सुख था उन पुराने दिनों में।
किसान वो सब याद करता है और उसकी दुःख भरी आह निकाल जाती है। उसके सुख भरे दिन अब बीत चुके हैं और उसकी आँखों के आगे नाचते रहते हैं।
बिना दवा दर्पन के घरनी
स्वरग चली,–आँखें आतीं भर,
देख रेख के बिना दुधमुँही
बिटिया दो दिन बाद गई मर!
घर में विधवा रही पतोहू,
लछमी थी, यद्यपि पति घातिन,
पकड़ मँगाया कोतवाल नें,
डूब कुँए में मरी एक दिन!
व्याख्या: इस कविता में किसानों के शोषण एवं शोषक का वर्णन किया गया है। स्वतंत्र भारत में भी किसानों की स्थिति दुःखदायक एवं निराशाजनक है। यह देख कर कवि दुःखी है।
इन पंक्तियों में किसान की परिवारिक स्थिति का वर्णन किया गया है। कवि कहता है कि दवा-इलाज के अभाव में किसान की पत्नी की मृत्यु हो गयी। उसे याद करके किसान की आँखें बार-बार भर आती हैं।
पत्नी की मौत के बाद देख-रेख के अभाव में दो दिन बाद उसकी नवजात बेटी की भी मृत्यु हो गयी ।
घर में बस एक उसकी विधवा बहू ही तो बची थी , बहू लक्ष्मी समान होती है। परंतु एक दिन कोतवाल ने उसे जबरन बुलवाया और यह कह कर बेइज्जती की कि इसके कारण इसके पति की जान चली गयी।
वह यह अपमान सह ना सकी और कुएं में डूब कर मौत को गले लगा लिया।
ख़ैर, पैर की जूती, जोरू
न सही एक, दूसरी आती,
पर जवान लड़के की सुध कर
साँप लोटते, फटती छाती!
पिछले सुख की स्मृति आँखों में
क्षण भर एक चमक है लाती,
तुरत शून्य में गड़ वह चितवन
तीखी नोक सदृश बन जाती।
व्याख्या: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-1‘ में संकलित कविता ‘वे आँखें’ से उद्धृत हैं। इसके कवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इस कविता में किसानों के शोषण एवं शोषक का वर्णन किया गया है।
किसान को अपनी पत्नी की मृत्यु का विशेष दुःख नहीं है उसे लगता है कि पत्नी तो पैर की जूती है , एक गयी तो दूसरी आ सकती है परंतु अपने जवान बेटे की मौत का उसे बहुत दुःख है । दुःख से उसकी छाती फटती है सीने पर साँप लोटते हैं। उसे असहनीय पीड़ा होती है।
बीते दिनों की यादें उसकी आँखों में पल भर के लिए चमक ले आती है , किन्तु अगले ही क्षण यथार्थ से उसका सामना होता है और उसकी आँखें शून्य में गड़ जाती हैं और तीखी नोक सी चुभती हैं।
प्रश्न 1. अंधकार की गुहा सरीखी
उन आँखों से डरता है मन।
(क) आमतौर पर हमें डर किन बातों से लगता है?
(ख) उन आँखों से किसकी ओर संकेत किया गया है?
(ग) कवि को उन आँखों से डर क्यों लगता है?
(घ) डरते हुए भी कवि ने उस किसान की आँखों की पीड़ा का वर्णन क्यों किया है?
(ङ) यदि कवि इन आँखों से नहीं डरता क्या तब भी वह कविता लिखता?
उत्तर: (क) आमतौर पर हमें आकस्मिक दुर्घटनाओं, परिवारजनों की मृत्यु, धन-संपत्ति की हानि , सम्मान की हानि, निर्धनता आदि से डर लगता है।
(ख) ‘उन आँखों’ से किसान की आँखों की ओर संकेत किया गया है जिसमें अतीत के सुख भरे दिनों की यादें और वर्तमान की पीड़ा के आँसू भरे हुए हैं।
(ग) कवि को उन आँखों से डर लगता है क्योंकि उन आँखों में असहनीय पीड़ा छुपी हुई है। वे आँखें किसी अंधेरी गुफा के समान है जिसमें दूर-दूर तक केवल अंधकार है और प्रकाश का कोई स्रोत नहीं है।
(घ) भारत एक कृषि प्रधान देश है फिर भी यहाँ के किसान शोषण के शिकार हो रहे हैं। स्वतन्त्रता के बाद भी किसानों को ध्यान में रखकर कोई ठोस निर्णय नहीं लिए गए हैं। किसान दुःखी हैं , अत्महत्या करने को विवश हैं।
पर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। समाज एवं सरकार को जागरूक करने का कवि ने प्रयास किया है इसलिए डरते हुए भी उसने किसान की आँखों की पीड़ा का वर्णन किया है।
(ङ) यदि कवि उन आँखों से नहीं डरता तो भी वह यह कविता अवश्य लिखता क्योंकि वह किसान की पीड़ा को गहराई से अनुभव कर सकता है।
प्रश्न 2. कविता में किसान की पीड़ा के लिए किन्हें जिम्मेदार बताया गया है?
उत्तर: कविता में किसान की पीड़ा के लिए महाजन , साहूकार , कोतवाल आदि को जिम्मेदार बताया गया है। क्योंकि महाजन ने ऋण चुकवाने के लिए किसान के घर, खेत, गाय , बैल सब को नीलाम करवा दिया।
साहूकार के आदमियों ने उसके बेटे की हत्या कर दी और कोतवाल ने उसकी विधवा बहू पर अत्याचार किया जिससे वह आत्महत्या करने को विवश हो गयी। इस प्रकार कविता में तत्कालीन उच्च वर्ग को किसान की पीड़ा का जिम्मेदार बताया गया है।
प्रश्न 3. “पिछले सुख की स्मृति आँखों में क्षण भर एक चमक है लाती” में किसान के किन पिछले सुखों की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर: प्रस्तुत पंक्ति में किसान के अतीत के सुखपूर्वक दिनों की ओर संकेत किया गया है। जिसमें उसके पास लहलहाते खेत थे, भरापूरा परिवार था, प्यारा सा घर था, दुधारू गाय थी, बैल थे।
इन सब को याद करके उसकी आँखों में पल भर को चमक आ जाती है। पर अगले ही क्षण वह चमक लौट जाती है क्योंकि उसे याद आ जाता है कि परिस्थितियों ने उससे सब कुछ छीन लिया है।
अब उसके पास इनमें से कुछ भी नहीं है और वह असहनीय पीड़ा से गुजर रहा है।
4. संदर्भ सहित आशय स्पष्ट करें।
(क) उजरी उसके सिवा किसे कब
पास दुहाने आने देती?
(ख) घर में विधवा रही पतोहू
लछमी थी, यद्यपि पति घातिन,
(ग) पिछले सुख की स्मृति आँखों में
क्षण भर एक चमक है लाती
तुरत शून्य में गड़ वह चितवन
तीखी नोक सदृश बन जाती
उत्तर: (क) प्रस्तुत पंक्तियाँ सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित ‘वे आँखें’ कविता से ली गयी हैं। इस कविता में कवि ने किसानों की दयनीय स्थिति का वर्णन किया है।
किसान के पास एक गाय थी जिसे वह प्यार से उजरी कह कर पुकारता था। उजरी उसके अलावा किसी को भी अपने पास आकर दूध दुहने की अनुमति नहीं देती थी।
उस गाय को भी महाजन ने नीलाम कर दिया ताकि किसान से पैसे वसूल कर सके। किसान उजरी को याद कर के दुःखी होता है।
(ख) प्रस्तुत पंक्तियाँ सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित ‘वे आँखें’ कविता से ली गयी हैं। इस कविता में कवि ने किसानों की दयनीय स्थिति का वर्णन किया है। साहूकार के आदमियों ने किसान के जवान बेटे को लठियों से पीट पीट कर मार डाला था। उसकी विधवा घर में अकेली रह गयी थी।
किसान की पत्नी और बेटी तो पहले ही मर चुके थे। बेटे की हत्या के बाद केवल बहू ही घर में रह गयी थी। बहू तो घर की लक्ष्मी होती है, परंतु अब पति की मृत्यु का दोष सब उसी को देते हैं और उसे पति-घातिन अर्थात पति की हत्यारिन कहते हैं।
(ग) प्रस्तुत पंक्तियाँ सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित ‘वे आँखें’ कविता से ली गयी हैं। इस कविता में कवि ने किसानों की दयनीय स्थिति का वर्णन किया है। किसान अपने पुराने दिनों को याद कर रहा है ।
कवि कहता है कि किसान जब अपने पुराने दिनों को याद करता है तो उसकी आँखों में पल भर के लिए चमक आ जाती है क्योंकि उन यादों में सब कुछ बहुत ही अच्छा है। उसके पास लहलहाते खेत हैं , घर है, परिवार है, गाय-बैल हैं।
परंतु अगले ही पल यथार्थ से उसका सामना होता है और उसकी आँखों की चमक आंसुओं में बदल जाती है। उसकी नज़र शून्य में गड़ जाती है और किसी तीखी नोक सी चुभने लगती है।
प्रश्न 5. “घर में विधवा रही पतोहू …../ खैर पैर की जूती, जोरू/एक न सही दूजी आती” इन पंक्तियों को ध्यान में रखते हुए ‘वर्तमान समाज और स्त्री’ विषय पर एक लेख लिखें|
उत्तर: वर्तमान समाज में भी स्त्रियों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। भारतीय समाज पहले भी पुरुष प्रधान था और आज भी पुरुष प्रधान ही है। स्त्रियॉं को बराबरी का दर्जा मिलना आज भी संभव नहीं हो पाया है।
पुराने जमाने में स्त्रियों को पैर की जूती समझा जाता था एक पत्नी मर जाए तो तुरंत दूसरी से विवाह कर लेते थे। पति की मृत्यु हो जाए तो उसकी विधवा को पति की हत्यारिन समझा जाता था और अत्याचार होता था।
आज के समय में भी विधवा स्त्री के ऊपर बहुत सी पाबन्दियाँ होती हैं। पर पुरुष को हर प्रकार की आज़ादी दी जाती है। आज भी देश के कई हिस्सों में विधवा को लोग अभिशाप मानते हैं। और उनको शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
उनका पुनर्विवाह नहीं कराया जाता है वहीं दूसरी ओर पुरुष बहुत जल्दी अन्य स्त्री से विवाह कर लेता है। हालांकि आज की स्त्रियों ने कई क्षेत्रों में परूषों को भी पीछे छोड़ दिया है ।
वे सफल हैं , सक्षम हैं और अपने पैरों पर खड़ी हैं और दूनिया भी उनका लोहा मानती है। परंतु देश के ज़्यादातर हिस्सों में लोगों की मानसिकता आज भी वही है जो कई दशकों पूर्व थी।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
कविता के साथ
प्रश्न 1.
अंधकार की गुहा सरीखी
उन आँखों से डरता है मन।
(क) आमतौर पर हमें डर किन बातों से लगता है?
(ख) उन आँखों से किसकी ओर संकेत किया गया है?
(ग) कवि को उन आँखों से डर क्यों लगता है?
(घ) डरते हुए भी कवि ने उस किसान की आँखों की पीड़ा का वर्णन क्यों किया है?
(ङ) यदि कवि इन आँखों से नहीं डरता क्या तब भी वह कविता लिखता ?
उत्तर:
(क) आमतौर पर हमें अंधकार, मृत्यु, आर्थिक हानि, अपमान, मार-पीट आदि से डर लगता है।
(ख) ‘उन आँखों’ से उजड़े हुए किसान की आँखों की ओर संकेत किया गया है। वह निराश, हताश व उदासीन है। उसका सब कुछ नष्ट हो चुका है।
(ग) किसान की आँखों में करुणा, पीड़ा व दीनता का भाव भरा है। इनमें भय व खालीपन है। कवि उसका सामना नहीं कर सकता। इस कारण उसे उन आँखों से डर लगता है।
(घ) कवि को किसान की आँखों से डर लगता है, परंतु फिर भी वह उसका वर्णन करता है, क्योंकि वह समाज को उसके कष्टों व समाज के उपेक्षापूर्ण रवैये के बारे में बताना चाहता है।
(ङ) यदि कवि इन आँखों से नहीं डरता तो वह कविता नहीं लिख पाता। इसका कारण यह है कि उसे किसान की पीड़ा का बोध नहीं होता। बिना बोध हुए कवि कुछ लिखने में सक्षम नहीं होता।
प्रश्न. 2.
कविता में किसान की पीड़ा के लिए किन्हें जिम्मेदार बताया गया है?
उत्तर:
कविता में किसान की पीड़ा के लिए समस्त संसार को जिम्मेदार बताया गया है। कवि कहता है कि किसान को बीच धारा में छोड़कर समस्त संसार किनारे हो गया है। हमारी सारी व्यवस्था इस किसान की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। स्वतंत्रता के पश्चात् भी समस्त समाज के अन्नदाता किसान को उसकी मेहनत का फल मिलना तो दूर रहा, उसका सर्वस्व छीन लिया जाना दुखद एवं दुर्भाग्यपूर्ण है।
प्रश्न. 3.
पिछले सुख की स्मृति आँखों में क्षण भर एक चमक है लाती-इसमें किसान के किन पिछले सुखों की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर:
किसान के पिछले सुख निम्नलिखित हो सकते हैं
(क) लहलहाती खेती
(ख) बैलों की जोड़ी
(ग) उजरी गाय
(घ) पत्नी, पुत्र, पुत्रवधू
(ङ) खेतों का स्वामित्व
इन सभी से उसे सुख मिलता था तथा वह अपने जीवन से संतुष्ट था। इन सबकी स्मृति से उसकी आँखों में क्षणभर के लिए चमक आ जाती है।
प्रश्न. 4.
संदर्भ सहित आशय स्पष्ट करेंउत्तर-
(क) उजरी उसके सिवा किसे कब
पास दुहाने आने देती?
(ख) घर में विधवा रही पतोहू
लछमी थी, यद्यपि पति घातिन
(ग) पिछले सुख की स्मृति आँखों में
क्षण भर एक चमक है लाती,
तुरत शून्य में गड़ वह चितवन,
तीखी नोक सदृश बन जाती।
उत्तर:
(क) संदर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘वे आँखें’ कविता में किसान के दुखद जीवन की उस स्थिति का वर्णन कर रही है जब उसके घर की एक-एक चीज़ महाजन के ब्याज की कौड़ी-कौड़ी चुकाने में कुर्क हो जाती है। सुमित्रानंदन पंत ने इन पंक्तियों में ऐसा वर्णन किया है जैसे वे स्वयं इस दशा को भोग रहे हों।
आशय – किसान के खेत-खलिहान, घर-द्वार सब बिक चुके हैं, फिर भी महाजन ने ब्याज की एक कौड़ी तक नहीं छोड़ी। वसूली करने के लिए महाजन ने बैलों की जोड़ी भी नीलाम करवा दी। इन पंक्तियों में किसान को अपनी उजली सफ़ेद गाय की याद आ रही है जो अब किसान के पास नहीं है। किसान सोच रहा है कि वह तो मेरी पत्नी के अतिरिक्त किसी से दूध ही नहीं दुहाती (निकलवाती) थी तो अब महाजन के घर मेरी गाय की क्या दशा होगी? जो भी उसके पास आता होगा उसे सींग मारती होगी या फिर वे लोग मेरी ‘उजरी’ को पीटते होंगे। इसी प्रकार सोच-सोचकर किसान की आँखों में उस समय के चित्र नाच उठे हैं जिस समय वह खुश था। ऐसी बातें याद करते हुए उसको मन घोर निराशा और दुख से भर जाता है।
(ख) संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘वे आँखें’ कविता में किसान के उजड़े हुए घर का वर्णन करने के लिए सुमित्रानंदन पंत’ द्वारा लिखी गई हैं। इन पंक्तियों में किसान की वेदना तो है ही, साथ-साथ समाज और परिवार में स्त्री के प्रति दुर्भावना का भी परिचय मिलता है। कवि इस स्थिति से पाठक को अवगत कराना चाहता है।
आशय – विपरीत परिस्थितियों में अनेक आर्थिक संकटों के चलते किसान अपनी पत्नी, पुत्र, पुत्री, बैलों की जोड़ी आदि को खो चुका है। अब उसके घर में केवल उसके मृत पुत्र की विधवा बहू बची है। परिवार की इस उजड़ी हुई दशा को सहन कर पाना बड़ा ही कठिन है। किसान उस बहू के घर की लक्ष्मी के रूप में लाया था, पर आज उसे पति का घात करने वाली कहकर तिरस्कृत किया जा रहा है। ग्रामीण कृषक संस्कृति और समाज में, स्त्री से पूर्व उसके पति को मृत्यु हो जाना अच्छा नहीं माना जाता और इस बात (मृत्यु) का दोषारोपण उस स्त्री पर ही किया जाता है। इसी बात का परिचय देते हुए पंत जी ने सामाजिक स्थिति का परिचय देने का प्रयास किया है। पाठक के समक्ष एक सामाजिक चित्र खींचा है।
(ग) संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियों की रचना ‘सुमित्रानंदन पंत’ द्वारा ‘वे आँखें’ कविता के अंतर्गत की गई है। इन पंक्तियों में कवि ने किसान की पीड़ाओं के साथ-साथ ग्रामीण समाज में स्त्रियों की दशा का भी वर्णन किया है।
आशय – अपने पिछले दिनों की यादें कृषक की आँखों में क्षणिक चमक लाती है पर तुरंत ही उस सुख के संसार के खोने का अहसास किसान की नज़रों को शून्य में गाड़ देता है। उसकी दृष्टि नुकीली चुभनदार बन जाती है। अर्थात् उसकी हर खुशी लुट चुकी है। उसे अपने खेत, बैल, पुत्र-पुत्री-पत्नी का बिछोह इतना सालता है कि उसकी सूनी आँखें शून्य में ताकती हुई निराशा से भरी रहती हैं।
कविता के आसपास
किसान अपने व्यवसाय से पलायन कर रहे हैं। इस विषय पर परिचर्चा आयोजित करें तथा कारणों की भी पड़ताल करें।
किसान अपने व्यवसाय से पलायन कर रहे हैं। इस विषय पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित करें तथा निम्नलिखित कारणों पर चर्चा की जा सकती है –कृषि लाभ का व्यवसाय है या नहीं।
रोज़गार के रूप में
बीज, सिंचाई, खाद आदि की कमी
उचित मूल्य न मिलना (5) कामचोरी
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न. 1.
‘वे आँखें’ कविता में आँखों को ‘अंधकार की गुफा के समान’ क्यों कहा गया है?
उत्तर:
‘वे आँखें’ कविता में किसान की आँखों का वर्णन करते हुए कवि किसान के आर्थिक, सामाजिक एवं पारिवारिक कष्टों के बिंब उसकी आँखों में देख रहा है। उसकी गरीबी, निराशा और सूनापन अंधकार के रूप में वर्णित है। इस अँधेरे से कवि स्वयं भयभीत है।
प्रश्न. 2.
स्वाधीन भारत में किसानों की क्या स्थिति है?
उत्तर:
स्वाधीन भारत में किसान को केंद्र में रखकर व्यवस्था ने निर्णायक हस्तक्षेप नहीं किया है। आज भी किसान विपन्नता और असुविधाओं के दुश्चक्र में फँसा हुआ है। यह बड़ा दुखद सत्य है कि अनेक पंचवर्षीय योजनाओं में किसान और कृषि के लिए धनराशि और नियम बने ज़रूर, पर उनका आंशिक लाभ भी किसान को नहीं मिल सका है।
प्रश्न. 3.
किसान के खेत, पुत्र और घर-द्वार के साथ क्या हुआ?
उत्तर:
किसान के खेतों से उसे बेदखल कर दिया गया। किसान के पुत्र को जमींदार के कारिंदों ने लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला। उधार चुकाने के लिए महाजन ने किसान का घर-द्वार सब बिकवा दिया। ब्याज की एक-एक कौड़ी चुकाने में उसकी बैलों की जोड़ी कुर्क कर ली गई।
प्रश्न. 4.
किसान की आँखों में कौन-सी खेती नाचती रहती है?
उत्तर:
एक समय था जब किसान के पास लहलहाते खेत थे, जवान बेटा था, अच्छी पत्नी थी, पुत्रवधू थी, बैलों की जोड़ी और उजली गाय से भरा-पूरा घर-द्वार था। इस सुख और वैभव के संसार में से अब उसके पास कुछ भी शेष नहीं है। यही उसके सुख की खेती थी जो अब उसकी आँखों में स्मृति बनकर नाचती रहती है।
प्रश्न. 5.
कवि ने किसान के रोदन को ‘नीरव’ क्यों कहा है?
उत्तर:
कवि का मानना है कि किसान की स्थिति दयनीय है। उसकी आँखों के अंदर दुख समाया हुआ है। उसकी आँखों में उसी दुख की छाया के रूप में रोने का भाव अनुभव किया जा सकता है। वह चीख-चीख कर रो नहीं रहा है। उस पर जो भी अत्याचार हुए हैं, वे सभी उसकी आँखों में झलक पड़ते हैं। अतः न रोते हुए भी उसके नीरव रोदन को कोई भी सुन सकता है।
प्रश्न. 6.
‘वे आँखें’ कविता में सामाजिक व्यवस्था के किन दोषों को उद्घाटित किया गया है?
उत्तर:
कविता यह बताती है कि खेतों का अधिकारी किसान, खेत में मजदूरी करते हुए दुखों को भोग रहा है। आज भी सामंतवाद की जड़ें हमारे गाँवों में जमी हुई हैं। किसान इतना बेबस है कि उसके पुत्र को जमींदार के कारिंदे लाठियों से पीट-पीटकर मार डालते हैं। पुत्र की बहू को कोतवाल बुलवाता है तो विवश होकर वह आत्महत्या कर लेती है। समाज में स्त्री की दुर्दशा का चित्रण है जब कवि किसान के पतोहू को पति घातिन कहता है; पैर की जूती कहता है। यहाँ हमारी सामाजिक व्यवस्था की कलई खोलने में कवि पूर्णत: सफल सिद्ध हुआ है।
प्रश्न. 7.
‘नारी को समाज में आज भी उचित सम्मान नहीं मिल रहा’-‘वे आँखें’ कविता के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
कवि नारी के प्रति रुग्ण सामाजिक मानसिकता को बताया है। पुत्र की हत्या हो जाने के पश्चात् किसान अपनी पतोह को गृह-लक्ष्मी स्वीकारता था, पर अब पति-घातिन कहता है। सुरक्षा के लिए तैनात सरकारी मुलाजिम कोतवाल उस विधवा की मृत्यु का कारण बनता है। किसान अपनी पतोहू की मौत से इतना दुखी नहीं है। वह कहता है कि औरत तो पैर की जूती के समान है, एक नहीं रही तो दूसरी आएगी, पर पुत्र की मौत याद आते ही दुख से उसकी छाती फटने लगती है। इन्हें पढ़कर पाठक स्पष्ट हो जाता है कि आज भी हमारा समाज संकीर्ण मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाया है।
प्रश्न. 8.
कौन-सी स्मृतियाँ किसान की आँखों में एक चमक ले आती हैं?
उत्तर:
किसान की आँखें पिछले सुख की स्मृतियों से चमक उठती हैं। जब किसान के सुख का संसार बसा हुआ था, वह लहलहाते खेतों का स्वामी था। उसके परिवार के सभी सदस्य पत्नी, पुत्र, पुत्रवधू, पुत्री, गाय, बैलों की जोड़ी थी। इन सबकी यादें क्षणभर के लिए ही सही किसान की आँखों में चमक ले आती हैं।
प्रश्न. 9.
सुमित्रानंदन पंत ने अपनी भाषा को चित्र भाषा (बिंबात्मक भाषा) की संज्ञा दी है; प्रस्तुत कविता के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
‘वे आँखें’ कविता में किसान की आँखें वह मंच है जिस पर बारी-बारी से किसान के दुखों का एक-एक चित्र चल रहा है। छोटी-छोटी काव्य पंक्तियों में सरल भाषा होते हुए भी अभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि हर दृश्य पाठक की आँखों में स्वतः उभरता है। किसान के पुत्र की लाठियों से पीट-पीटकर हत्या, लहलहाते खेतों से किसान का बेदखल किया जाना, कोतवाल के बुलाए जाने पर पुत्रवधू का आत्महत्या कर लेना और उजली गाय द्वारा किसान की पत्नी के सिवाय और किसी से दूध न दुहाना ऐसे बिंब हैं जो किसान की आँखों से स्वतः ही पाठक की आँखों में झलकने लगते हैं।
प्रश्न. 10.
‘वे आँखें’ कविता में ‘पैर की जूती’ किसे कहा गया है? इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘पैर की जूती’ जोरू-स्त्री, पत्नी के लिए कहा गया है। इसका अर्थ है कि समाज की नज़रों में स्त्री तुच्छ-सी वस्तु है। यदि एक मर भी गई तो दूसरी आ जाएगी।
प्रश्न. 11.
‘जीवन की हरियाली’ से क्या तात्पर्य है? ‘वे आँखें’ कविता के आधार पर बताइए।
उत्तर:
जीवन की हरियाली अर्थात् जीवन की खुशी, प्रसन्नता और एक-एक आवश्यकता को पूरा करने के लिए किसान खेत के एक-एक तिनके पर ही निर्भर था।
प्रश्न. 12.
किसान की आँखों का तारा’ अब केवल उसकी आँखों में ही क्यों घूमता रहता है?
उत्तर:
किसान के पुत्र को जमींदार के कारिंदों ने लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला। जवान पुत्र की निर्मम हत्या को किसान भुला नहीं सकता। अतः उसकी छवि सदैव उसकी आँखों में ही घूमती रहती है।

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