अक्क महादेवी का जीवन परिचय –
अक्क महादेवी का जन्म 12 वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में स्थित उदुतदी नाम के स्थान पर हुआ था l बाल्यावस्था से ही ये मल्लिकार्जुन अर्थात भगवान शिव की भक्ति करने लगी l मात्र 10 वर्ष की आयु में इन्होंने शिव गुरू का मंत्र ले लिया l इन्होंने भगवान शिव की भक्ति को अपनी कविताओं में बखूबी चित्रित किया l
अक्क महादेवी वीर शैव धर्म से संबंधित महिला थी जिन्होंने अपने वचनों के कारण बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की l इनके वचनों को कन्नड़ भाषा में उच्च स्थान प्राप्त है l इन्होंने लगभग चार सौ तीस वचन कहें l इनका मानना था कि वे केवल नाम मात्र से स्त्री हैं, किंतु उनका, शरीर, आत्मा सब प्रभु शिव का है l
अक्क महादेवी कविता का सारांश –
अक्क महादेवी की कविता हे! भूख मत मचल बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता है। अक्क महादेवी जी कर्नाटक के प्रसिद्ध कवयित्री के रूप में जानी जाती है। इस कविता में कवयित्री भूख से कहती हैं कि तू ज्यादा मत मचल इससे उनकी भक्ति में अवरोध उत्पन्न होता है।
कवयित्री कविता के माध्यम से ईश्वर के प्रति अपनी संपूर्ण भक्ति को व्यक्त करती है। प्रस्तुत कविता में अहंकार को नष्ट कर ईश्वर की भक्ति में खुद को समाहित करने की बात की गई है।
अक्क महादेवी के वचन कविता –
(1 )
हे भूख मात मचल,
हे प्यास, तड़प, मन है नींद,
मत सता क्रोध,
मचा मत उथल पुथल हे
मोह पाश अपने ढील लोभ
मत ललचा हे मद मत कर ,
मदहोश इर्ष्या जला मत,
ओ चराचर मत चूक अवसर आई हूँ,
संदेश लेकर चन्नमल्लिकार्जुन का
(2 )
हे मेरे जूही के फूल जेसे ईश्वर,
मँगवाओ मुझसे भीख,
और कुछ ऐसा करो कि भूल जाऊँ
अपना घर, पूरी तरह झोली फैलाऊँ,
न मिले भीख कोइ,
हाथ बढ़ाए कुछ
देने को तो वह गिर जाये,
और यदि में नीचे झुकूँ उसे उठाने
तो कोई कुत्ता और उसे
झपटकर छीन ले मुझसे l
अक्क महादेवी के वचन कविता की व्याख्या –
हे भूख मात मचल,
हे प्यास, तड़प, मन है नींद,
मत सता क्रोध,
मचा मत उथल पुथल हे
मोह पाश अपने ढील लोभ
मत ललचा हे मद मत कर ,
मदहोश इर्ष्या जला मत,
ओ चराचर मत चूक अवसर आई हूँ,
संदेश लेकर चन्नमल्लिकार्जुन का
व्याख्या- कवयित्री कहती हैं कि हे भूख, प्यास, मुझे मत सता, मेरे भीतर जो क्रोध मुझे मत सता, मुझे नींद ना आये एसा कुछ कर, मेरे भीतर जो उथल पुथल चल रही है उससे मुझे बचा ले l मुझे किसी बंधन में मत बाँध, मेरे भीतर किसी लोभ मोह को मत जगा, मुझे दूसरों की खुशियाँ देख कर इर्ष्या करने से रोक ले l यह अवसर मत चुको, मुझे भगवान शिव की उपासना का अवसर मिला है l
हे मेरे जूही के फूल जेसे ईश्वर,
मँगवाओ मुझसे भीख,
और कुछ ऐसा करो कि भूल जाऊँ
अपना घर, पूरी तरह झोली फैलाऊँ,
न मिले भीख कोइ,
हाथ बढ़ाए कुछ
देने को तो वह गिर जाये,
और यदि में नीचे झुकूँ उसे उठाने
तो कोई कुत्ता और उसे
झपटकर छीन ले मुझसे l
व्याख्या- कवयित्री कहती हैं कि हे जूही के फूल जैसे ईश्वर मेरी ऐसी परिस्थिति बनाओ की मुझे भीख माँगनी पड़े, और फिर ऐसा कर दो कि कोइ मुझे भीख न दे। अगर कोइ देना भी चाहे तो वह नीचे गिर जाए l और मैं अगर उसे उठाने के लिए झुकूं तो कोइ कुत्ता उसे मुझसे छीन लेl इससे मेरे भीतर जो भी अंहकार है, वो टूट जाय और में अपने भगवान मल्लिकाअर्जुन की भक्ति में लीन हो सकूँl
प्रश्न 1: लक्ष्य प्राप्ति में इंद्रियां बाधक होती हैं- इस के संदर्भ में अपने तर्क दीजिए।
उत्तर- इंद्रिया अर्थात आँखें। यह बात बिल्कुल सत्य है कि लक्ष्य की प्राप्ति में इंद्रियां बंधक साबित हुई हैं। आंखों के माध्यम से हम संपूर्ण विश्व को देखते हैं। सुख- दुःख, मोह माया, सब इसी आंखों के कारण मनुष्य के मन में व्याप्त होता है। मनुष्य को अच्छे से भटकाने में इंद्रियां बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं।
प्रश्न 2: ओ चराचर! मत चूक अवसर- इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- चराचर का अर्थ है संसार। कविता के माध्यम से एवं इस पंक्ति के माध्यम से कवयित्री ने संसार के लोगों से यह आह्वान किया है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए जो भी अवसर उन्हें प्राप्त हुए हैं, उन्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।
प्रश्न 3: ईश्वर के लिए किस दृष्टांत का प्रयोग किया गया है। ईश्वर और उसके साम्य आधार बताइए।
उत्तर- जूही के फूल को दृष्टांत के रूप में प्रयोग किया गया है। जूही का फूल जितना पवित्र, सुगंधित एवं आनंद से भरपूर होता है। ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी है- सुगंधित, पवित्र एवं आनंद से भरपूर।
प्रश्न 4: अपना घर से क्या तात्पर्य है? इसे भूलने की बात क्यों कही गई है?
उत्तर- यहां पर संसार को अपना घर बताया गया है। ईश्वर अपने इस संसार को भूलना चाहती है। कवयत्री भक्ति मार्ग में ही अपने जीवन को समर्पित कर देना चाहती है। कवयित्री कहती हैं कि जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियां आ जाए कि भीख मांगनी पड़े। भीख मांगने पर भी कुछ ना मिले। वह संसार के समस्त सुख एवं सुविधाओं से वंचित होकर एकल स्थान पर साधना करना चाहती है।
प्रश्न 5: दूसरे वचन में ईश्वर से क्या कामना की गई है और क्यों?
उत्तर- दूसरे वजन में कवयत्री ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहती हैं कि उनका समस्त सुख कम हो जाएं। कवयत्री ऐसी परिस्थिति की कल्पना करती है, जो शायद वर्तमान में संभव नहीं है।
अक्क महादेवी अतरिक्त प्रश्न-अभ्यास –
प्रश्न 1: कवयित्री किन आदतों का त्याग करना चाहती है?
उत्तर- कवयित्री अपने, भूख, नींद, प्यास, तड़प, क्रोध, मोह और इर्ष्या को त्यागना चाहती है l
प्रश्न : कवयित्री हर तरह के कष्ट क्यों उठाना चाहती है?
उत्तर- कवयित्री हर तरह के कष्ट उठाना चाहती है, क्योंकि वह संसार के लोभ, मोह, क्रोध, इर्ष्या से मुक्त हो और अपने अराध्य भगवान मल्लिकार्जुन (शिव) की आराधना में लीन हो सके l
प्रश्न 3: कवयित्री किसका संदेश लोगों तक भेजना चाहती है?
उत्तर- कवयित्री भगवान शिव का संदेश लोगों तक पहुंचाना चाहती है l
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
कविता के साथ
प्रश्न. 1.
लक्ष्य प्राप्ति में इंद्रियाँ बाधक होती हैं-इसके संदर्भ में अपने तर्क दीजिए।
उत्तर:
लक्ष्य प्राप्ति में इंद्रियाँ बाधक होती हैं। मनुष्य की इंद्रियों का कार्य है-स्वयं को तृप्त करना। इनकी तृप्ति के चक्कर में मनुष्य जीवन भर भटकता रहता है। इंद्रियाँ मनुष्य को भ्रमित करती हैं तथा उसे कर्महीनता की तरफ प्रेरित करती हैं। इसके लिए इंद्रियों पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। किसी लक्ष्य को तभी प्राप्त किया जा सकता है जब मन में एकाग्रता हो तथा इंद्रियों को वश में रखकर परिश्रम किया जाए। प्रत्येक लक्ष्य में इंद्रियाँ बाधक बनती हैं, परंतु बुदधि द्वारा उनको वश में किया जा सकता है।
प्रश्न. 2.
ओ चराचर! मत चूक अवसर-इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यह पंक्ति अक्कमहादेवी अपने प्रथम वचन में उस समय कहती हैं जब वे अपने समस्त विकारों को शांत हो जाने के लिए। कह चुकी हैं। इसका आशय है कि इंद्रियों के सुख के लिए भाग-दौड़ बंद करने के पश्चात् ईश्वर प्राप्ति का मार्ग सरल हो जाता है। अतः चराचर (जड़-चेतन) को संबोधित कर कहती हैं कि तू इस मौके को मत खोना। विकारों की शांति के पश्चात् ईश्वर प्राप्ति का अवसर तुम्हारे हाथ में है, इसका सदुपयोग करो।
प्रश्न. 3.
ईश्वर के लिए किस दृष्टांत का प्रयोग किया गया है। ईश्वर और उसके साम्य का आधार बताइए।
उत्तर:
ईश्वर के लिए जूही के फूल का दृष्टांत दिया गया है। जूही का फूल कोमल, सात्विक, सुगंधित व श्वेत होता है। यह लोगों का मन मोह लेता है। वह बिना किसी भेदभाव के सबको खुशबू बाँटता है। इसी तरह ईश्वर भी सभी प्राणियों को आनंद देता है। वह कोई भेदभाव नहीं करता तथा सबका कल्याण करता है।
प्रश्न. 4.
अपना घर से क्या तात्पर्य है? इसे भूलने की बात क्यों कही गई है?
उत्तर:
अपना घर से तात्पर्य सांसारिक मोह-माया से है। संसार की वह चीजें जो हमें अपने-आप में उलझा लेती हैं, जिनसे हम प्रेम करते हैं वे हमारे ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में बाधक होती हैं। यदि हम उन्हें भूल जाएँ तो ईश्वर की ओर हमारा मन पूरी एकाग्रता के साथ लगता है। इसीलिए उन्हें भूल जाने की बात कही गई है।
प्रश्न. 5.
दूसरे वचन में ईश्वर से क्या कामना की गई है और क्यों?
उत्तर:
दूसरे वचन में ईश्वर से सब कुछ छीन लेने की कामना की गई है। कवयित्री ईश्वर से प्रार्थना करती है कि वह उससे सभी तरह के भौतिक साधन, संबंध छीन ले। वह ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करे कि वह भीख माँगने के लिए मजबूर हो जाए। इससे उसका अहभाव नष्ट हो जाएगा। दूसरे, भूख मिटाने के लिए जब वह झोली फैलाए तो उसे भीख न मिले। अगर कोई देने के लिए आगे आए तो वह भीख नीचे गिर जाए। जमीन पर गिरी भीख को भी कुत्ता झपटकर ले जाए। वस्तुत: कवयित्री ईश्वर से सांसारिक लगाव को समाप्त करने के लिए कामना करती है ताकि वह ईश्वर में ध्यान एकाग्र भाव से लगा सके।
कविता के आस-पास
प्रश्न. 1.
क्या अक्कमहादेवी को कन्नड़ की मीरा कहा जा सकता है? चर्चा करें।
उत्तर:
हाँ, अक्क महादेवी को कन्नड़ की मीरा कहा जा सकता है। दोनों ने वैवाहिक जीवन को तोड़ा। दोनों ने सामाजिक बंधनों को नहीं माना। मीरा कृष्ण की दीवानी थी। उसने अपने जीवन में कृष्ण को अपना लिया था। इसी तरह अक्क महादेवी शिव की भक्त थीं। वे सांसारिकता को त्यागकर शिव के प्रति समर्पित थीं। वे मीरा से भी एक कदम आगे थीं। उन्होंने तो वस्त्र भी त्याग दिए थे। यह कार्य उन्हें योगियों के समक्ष लाकर खड़ा कर देता है।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न. 1.
प्रस्तुत वचन में मनुष्य के कौन-कौन से स्वाभाविक विकारों का उल्लेख किया गया है?
उत्तर:
प्रत्येक मनुष्य में स्वाभाविक रूप से लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद, ईष्र्या, नींद आदि विकार होते हैं। अक्कमहादेवी द्वारा प्रथम वचन में इनका उल्लेख किया गया है।
प्रश्न. 2.
सभी विकारों की शांति क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसे हम तृष्णाओं के पीछे भागते हुए गवाँ देते हैं और अंत तक तृष्णाएँ शांत नहीं हो पातीं, जिससे हम ईश्वर प्राप्ति की ओर नहीं बढ़ पाते। इसलिए इन्हें शांत करना आवश्यक है।
प्रश्न. 3.
‘मत चूक अवसर’ का क्या आशय है?
उत्तर:
मानव-जीवन दुर्लभ है, इसमें रहकर हम ईश्वर को प्राप्त करने का कार्य बड़ी सरलता से कर सकते हैं। कवयित्री अपने आराध्य के संदेश के रूप में यह बात हमें समझा रही हैं कि ईश्वर की ओर बढ़ो! संसार में उलझकर मौके को खो देना ठीक नहीं।
प्रश्न. 4.
हम सभी धन चाहते हैं और अक्क महादेवी भीख माँगने की कामना करती हैं। क्यों?
उत्तर:
हम और हमारा मन सांसारिक आकर्षणों में लीन रहना चाहते हैं, जबकि अक्क महादेवी संसार से विरक्त होकर ईश्वर को पाना चाहती हैं। इसलिए वे सभी भौतिक वस्तुओं और मोह-बंधन को त्यागकर स्वयं के दंभ को चूर-चूर का निस्पृह स्थिति में पहुँचना चाहती हैं।
प्रश्न. 5.
अहंकार ईश्वर प्राप्ति में बाधक है। कैसे?
उत्तर:
ईश्वर एक ऐसी अनुभूति है जिसमें हम स्वयं को भूलकर, अपने अस्तित्व को खोकर ईश्वर में ही लीन हो जाते हैं। यदि हम में अहं-भाव है तो विनम्र-भाव नहीं हो सकता और इस दशा में हम ईश्वर में लीन होना तो दूर, उसके समक्ष झुक भी नहीं सकते। अतः ईश्वर के साथ एकाकार होने के लिए अहं का त्याग जरूरी है।
प्रश्न. 6.
पहले भीख और फिर भोजन के न मिलने की कामना क्यों की गई है?
उत्तर:
सभी अहंकारों और आत्म-सम्मान को त्यागने के बाद ही कोई भीख माँग सकता है और भोजन को भी कोई कुत्ता झपट ले तो मन वैराग्य की ओर बढ़ता है। इसीलिए यह कामना की गई है।
प्रश्न. 7.
कवयित्री मनोविकारों को क्यों दुत्कारती है?
उत्तर:
कवयित्री मनोविकारों को बंधन का कारण मानती है। मनोविकार मनुष्य को सांसारिक मोहमाया में लिप्त रखते हैं। मोह से संग्रह, क्रोध से विवेक खोना, लोभ से गलत कार्य, अहंकार से मदहोश आदि प्रवृत्तियों का उदय होता है। इस कारण मनुष्य स्वयं को महान समझता है। इसी अहंभाव के कारण मानव ईश्वर भक्ति से दूर हो जाता है।
प्रश्न. 8.
कवयित्री ने ईश्वर और जूही के माध्यम से क्या उदाहरण दिया है?
उत्तर:
कवयित्री का कहना है कि जिस प्रकार जूही का फूल अपनी खुशबू से लोगों को आनंद देता है, उसी प्रकार ईश्वर लोगों का कल्याण करता है।
उत्तर- यहां पर संसार को अपना घर बताया गया है। ईश्वर अपने इस संसार को भूलना चाहती है। कवयत्री भक्ति मार्ग में ही अपने जीवन को समर्पित कर देना चाहती है। कवयित्री कहती हैं कि जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियां आ जाए कि भीख मांगनी पड़े। भीख मांगने पर भी कुछ ना मिले। वह संसार के समस्त सुख एवं सुविधाओं से वंचित होकर एकल स्थान पर साधना करना चाहती है।
प्रश्न 5: दूसरे वचन में ईश्वर से क्या कामना की गई है और क्यों?
उत्तर- दूसरे वजन में कवयत्री ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहती हैं कि उनका समस्त सुख कम हो जाएं। कवयत्री ऐसी परिस्थिति की कल्पना करती है, जो शायद वर्तमान में संभव नहीं है।
अक्क महादेवी अतरिक्त प्रश्न-अभ्यास –
प्रश्न 1: कवयित्री किन आदतों का त्याग करना चाहती है?
उत्तर- कवयित्री अपने, भूख, नींद, प्यास, तड़प, क्रोध, मोह और इर्ष्या को त्यागना चाहती है l
प्रश्न : कवयित्री हर तरह के कष्ट क्यों उठाना चाहती है?
उत्तर- कवयित्री हर तरह के कष्ट उठाना चाहती है, क्योंकि वह संसार के लोभ, मोह, क्रोध, इर्ष्या से मुक्त हो और अपने अराध्य भगवान मल्लिकार्जुन (शिव) की आराधना में लीन हो सके l
प्रश्न 3: कवयित्री किसका संदेश लोगों तक भेजना चाहती है?
उत्तर- कवयित्री भगवान शिव का संदेश लोगों तक पहुंचाना चाहती है l
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
कविता के साथ
प्रश्न. 1.
लक्ष्य प्राप्ति में इंद्रियाँ बाधक होती हैं-इसके संदर्भ में अपने तर्क दीजिए।
उत्तर:
लक्ष्य प्राप्ति में इंद्रियाँ बाधक होती हैं। मनुष्य की इंद्रियों का कार्य है-स्वयं को तृप्त करना। इनकी तृप्ति के चक्कर में मनुष्य जीवन भर भटकता रहता है। इंद्रियाँ मनुष्य को भ्रमित करती हैं तथा उसे कर्महीनता की तरफ प्रेरित करती हैं। इसके लिए इंद्रियों पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। किसी लक्ष्य को तभी प्राप्त किया जा सकता है जब मन में एकाग्रता हो तथा इंद्रियों को वश में रखकर परिश्रम किया जाए। प्रत्येक लक्ष्य में इंद्रियाँ बाधक बनती हैं, परंतु बुदधि द्वारा उनको वश में किया जा सकता है।
प्रश्न. 2.
ओ चराचर! मत चूक अवसर-इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यह पंक्ति अक्कमहादेवी अपने प्रथम वचन में उस समय कहती हैं जब वे अपने समस्त विकारों को शांत हो जाने के लिए। कह चुकी हैं। इसका आशय है कि इंद्रियों के सुख के लिए भाग-दौड़ बंद करने के पश्चात् ईश्वर प्राप्ति का मार्ग सरल हो जाता है। अतः चराचर (जड़-चेतन) को संबोधित कर कहती हैं कि तू इस मौके को मत खोना। विकारों की शांति के पश्चात् ईश्वर प्राप्ति का अवसर तुम्हारे हाथ में है, इसका सदुपयोग करो।
प्रश्न. 3.
ईश्वर के लिए किस दृष्टांत का प्रयोग किया गया है। ईश्वर और उसके साम्य का आधार बताइए।
उत्तर:
ईश्वर के लिए जूही के फूल का दृष्टांत दिया गया है। जूही का फूल कोमल, सात्विक, सुगंधित व श्वेत होता है। यह लोगों का मन मोह लेता है। वह बिना किसी भेदभाव के सबको खुशबू बाँटता है। इसी तरह ईश्वर भी सभी प्राणियों को आनंद देता है। वह कोई भेदभाव नहीं करता तथा सबका कल्याण करता है।
प्रश्न. 4.
अपना घर से क्या तात्पर्य है? इसे भूलने की बात क्यों कही गई है?
उत्तर:
अपना घर से तात्पर्य सांसारिक मोह-माया से है। संसार की वह चीजें जो हमें अपने-आप में उलझा लेती हैं, जिनसे हम प्रेम करते हैं वे हमारे ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में बाधक होती हैं। यदि हम उन्हें भूल जाएँ तो ईश्वर की ओर हमारा मन पूरी एकाग्रता के साथ लगता है। इसीलिए उन्हें भूल जाने की बात कही गई है।
प्रश्न. 5.
दूसरे वचन में ईश्वर से क्या कामना की गई है और क्यों?
उत्तर:
दूसरे वचन में ईश्वर से सब कुछ छीन लेने की कामना की गई है। कवयित्री ईश्वर से प्रार्थना करती है कि वह उससे सभी तरह के भौतिक साधन, संबंध छीन ले। वह ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करे कि वह भीख माँगने के लिए मजबूर हो जाए। इससे उसका अहभाव नष्ट हो जाएगा। दूसरे, भूख मिटाने के लिए जब वह झोली फैलाए तो उसे भीख न मिले। अगर कोई देने के लिए आगे आए तो वह भीख नीचे गिर जाए। जमीन पर गिरी भीख को भी कुत्ता झपटकर ले जाए। वस्तुत: कवयित्री ईश्वर से सांसारिक लगाव को समाप्त करने के लिए कामना करती है ताकि वह ईश्वर में ध्यान एकाग्र भाव से लगा सके।
कविता के आस-पास
प्रश्न. 1.
क्या अक्कमहादेवी को कन्नड़ की मीरा कहा जा सकता है? चर्चा करें।
उत्तर:
हाँ, अक्क महादेवी को कन्नड़ की मीरा कहा जा सकता है। दोनों ने वैवाहिक जीवन को तोड़ा। दोनों ने सामाजिक बंधनों को नहीं माना। मीरा कृष्ण की दीवानी थी। उसने अपने जीवन में कृष्ण को अपना लिया था। इसी तरह अक्क महादेवी शिव की भक्त थीं। वे सांसारिकता को त्यागकर शिव के प्रति समर्पित थीं। वे मीरा से भी एक कदम आगे थीं। उन्होंने तो वस्त्र भी त्याग दिए थे। यह कार्य उन्हें योगियों के समक्ष लाकर खड़ा कर देता है।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न. 1.
प्रस्तुत वचन में मनुष्य के कौन-कौन से स्वाभाविक विकारों का उल्लेख किया गया है?
उत्तर:
प्रत्येक मनुष्य में स्वाभाविक रूप से लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद, ईष्र्या, नींद आदि विकार होते हैं। अक्कमहादेवी द्वारा प्रथम वचन में इनका उल्लेख किया गया है।
प्रश्न. 2.
सभी विकारों की शांति क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसे हम तृष्णाओं के पीछे भागते हुए गवाँ देते हैं और अंत तक तृष्णाएँ शांत नहीं हो पातीं, जिससे हम ईश्वर प्राप्ति की ओर नहीं बढ़ पाते। इसलिए इन्हें शांत करना आवश्यक है।
प्रश्न. 3.
‘मत चूक अवसर’ का क्या आशय है?
उत्तर:
मानव-जीवन दुर्लभ है, इसमें रहकर हम ईश्वर को प्राप्त करने का कार्य बड़ी सरलता से कर सकते हैं। कवयित्री अपने आराध्य के संदेश के रूप में यह बात हमें समझा रही हैं कि ईश्वर की ओर बढ़ो! संसार में उलझकर मौके को खो देना ठीक नहीं।
प्रश्न. 4.
हम सभी धन चाहते हैं और अक्क महादेवी भीख माँगने की कामना करती हैं। क्यों?
उत्तर:
हम और हमारा मन सांसारिक आकर्षणों में लीन रहना चाहते हैं, जबकि अक्क महादेवी संसार से विरक्त होकर ईश्वर को पाना चाहती हैं। इसलिए वे सभी भौतिक वस्तुओं और मोह-बंधन को त्यागकर स्वयं के दंभ को चूर-चूर का निस्पृह स्थिति में पहुँचना चाहती हैं।
प्रश्न. 5.
अहंकार ईश्वर प्राप्ति में बाधक है। कैसे?
उत्तर:
ईश्वर एक ऐसी अनुभूति है जिसमें हम स्वयं को भूलकर, अपने अस्तित्व को खोकर ईश्वर में ही लीन हो जाते हैं। यदि हम में अहं-भाव है तो विनम्र-भाव नहीं हो सकता और इस दशा में हम ईश्वर में लीन होना तो दूर, उसके समक्ष झुक भी नहीं सकते। अतः ईश्वर के साथ एकाकार होने के लिए अहं का त्याग जरूरी है।
प्रश्न. 6.
पहले भीख और फिर भोजन के न मिलने की कामना क्यों की गई है?
उत्तर:
सभी अहंकारों और आत्म-सम्मान को त्यागने के बाद ही कोई भीख माँग सकता है और भोजन को भी कोई कुत्ता झपट ले तो मन वैराग्य की ओर बढ़ता है। इसीलिए यह कामना की गई है।
प्रश्न. 7.
कवयित्री मनोविकारों को क्यों दुत्कारती है?
उत्तर:
कवयित्री मनोविकारों को बंधन का कारण मानती है। मनोविकार मनुष्य को सांसारिक मोहमाया में लिप्त रखते हैं। मोह से संग्रह, क्रोध से विवेक खोना, लोभ से गलत कार्य, अहंकार से मदहोश आदि प्रवृत्तियों का उदय होता है। इस कारण मनुष्य स्वयं को महान समझता है। इसी अहंभाव के कारण मानव ईश्वर भक्ति से दूर हो जाता है।
प्रश्न. 8.
कवयित्री ने ईश्वर और जूही के माध्यम से क्या उदाहरण दिया है?
उत्तर:
कवयित्री का कहना है कि जिस प्रकार जूही का फूल अपनी खुशबू से लोगों को आनंद देता है, उसी प्रकार ईश्वर लोगों का कल्याण करता है।

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