माखनलाल चतुर्वेदी का जीवन परिचय- : माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में बाबई नामक गांव में सन 1889 में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा के बाद इन्होंने घर पर ही संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी, गुजराती आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। वे भारत के ख्याति-प्राप्त कवि, लेखक और पत्रकार थे, जिनकी रचनाएँ अत्यंत लोकप्रिय हुईं। वे सरल भाषा और जोशीली भावनाओं के अनूठे हिन्दी रचनाकार थे। प्रभा और कर्मवीर जैसे प्रतिष्ठित पत्रों के संपादक के रूप में उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ ज़ोरदार प्रचार किया और नई पीढी से आह्वान किया कि वह गुलामी की जंज़ीरों को तोड़ कर बाहर आए। वे सच्चे देशप्रेमी थे और 1921-22 के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए जेल भी गए। उनकी कविताओं में हमें देशप्रेम के साथ-साथ प्रकृति और प्रेम का भी चित्रण मिलता है।
हिम किरीटनी, साहित्य देवता, हिम तरंगिनी, वेणु लो गूंजे धरा उनकी प्रमुख कविताओं में से एक है। अपने जीवनकाल में उन्होंने अध्यापन एवं संपादन दोनों का कार्य किया। उन्हें ‘देव पुरस्कार’, पद्मभूषण एवं साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपनी कविताओं में शिल्प की तुलना में भावना को ज़्यादा महत्त्व दिया है और यही कारण है कि उन्होंने अपनी रचनाओं में बोलचाल की भाषा का उपयोग किया है।
कैदी और कोकिला का भावार्थ – : कवि ने “कैदी और कोकिला” कविता उस समय लिखी थी, जब देश ब्रिटिश शासन के अधीन गुलामी के जंजीरों में जकड़ा हुआ था। वे खुद भी एक स्वतंत्रता सेनानी थे, जिस वजह से उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। जेल में रहने के दौरान वे इस बात से अवगत हुए कि जेल जाने के बाद स्वतंत्रता सेनानियों के साथ कितना दुर्व्यवहार होता है। इसी सोच को उस समय समस्त जनता के सामने लाने के लिए उन्होंने इस कविता की रचना की।
अपनी इस कविता में कवि ने जेल में बंद एक स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ एक कोयल का वर्णन भी किया है। कविता में कवि हमें उस समय जेल में मिल रही यातनाओं के बारे में बता रहा है। कवि (कैदी) के अनुसार, जहाँ पर चोर-डाकुओं को रखा जाता है, वहाँ उन्हें (स्वतंत्रता सेनानियों) को रखा गया है। उन्हें भर-पेट भोजन भी नसीब नहीं होता। ना वह रो सकते हैं और ना ही चैन की नींद सो सकते हैं। जेल में उन्हें बेड़ियाँ और हथकड़ियाँ पहन कर रहना पड़ता है। वहां उन्हें ना तो चैन से जीने दिया जाता है और ना ही चैन से मरने दिया जाता है। ऐसे में, कवि चाहते हैं कि यह कोयल समस्त देशवासियों को मुक्ति का गीत सुनाये।
कैदी और कोकिला –
क्या गाती हो?
क्यों रह-रह जाती हो?
कोकिल बोलो तो!
क्या लाती हो?
सन्देश किसका है?
कोकिल बोलो तो!
ऊँची काली दीवारों के घेरे में,
डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,
जीने को देते नहीं पेट-भर खाना
मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना!
जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,
शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?
हिमकर निराश कर चला रात भी काली,
इस समय कालिमामयी जगी क्यूँ आली?
क्यों हूक पड़ी?
वेदना बोझ वाली-सी;
कोकिल बोलो तो!
क्या लुटा?
मृदुल वैभव की
रखवाली-सी,
कोकिल बोलो तो!
क्या हुई बावली?
अर्ध रात्रि को चीखी,
कोकिल बोलो तो!
किस दावानल की
ज्वालायें हैं दीखी?
कोकिल बोलो तो!
क्या? -देख न सकती जंजीरों का गहना?
हथकड़ियाँ क्यों? ये ब्रिटिश-राज का गहना,
कोल्हू का चर्रक चूँ?- जीवन की तान,
गिट्टी पर अंगुलियों ने लिखे गान!
हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ,
खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूँआ।
दिन में करुणा क्यों जगे, रुलानेवाली,
इसलिए रात में गज़ब ढा रही आली?
इस शांत समय में,
अंधकार को बेध, रो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो!
चुपचाप, मधुर विद्रोह-बीज
इस भाँति बो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो!
काली तू, रजनी भी काली,
शासन की करनी भी काली,
काली लहर कल्पना काली,
मेरी काल कोठरी काली,
टोपी काली, कमली काली,
मेरी लौह-श्रृंखला काली,
पहरे की हुंकृति की ब्याली,
तिस पर है गाली, ऐ आली!
इस काले संकट-सागर पर
मरने की, मदमाती!
कोकिल बोलो तो!
अपने चमकीले गीतों को
क्योंकर हो तैराती!
कोकिल बोलो तो!
तुझे मिली हरियाली डाली,
मुझे मिली कोठरी काली!
तेरा नभ-भर में संचार
मेरा दस फुट का संसार!
तेरे गीत कहावें वाह,
रोना भी है मुझे गुनाह!
देख विषमता तेरी-मेरी,
बजा रही तिस पर रणभेरी!
इस हुंकृति पर,
अपनी कृति से और कहो क्या कर दूँ?
कोकिल बोलो तो!
मोहन के व्रत पर,
प्राणों का आसव किसमें भर दूँ!
कोकिल बोलो तो!
– कैदी और कोकिला कविता का अर्थक्या गाती हो?
क्यों रह-रह जाती हो?
कोकिल बोलो तो!
क्या लाती हो?
सन्देश किसका है?
कोकिल बोलो तो!
कैदी और कोकिला भावार्थ :- उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने कारागार में बंद एक स्वतंत्रता सेनानी की मनोदशा को दर्शाया है। रात के घोर अंधकार में कारागृह के ऊपर जब वह एक कोयल को गाते हुए सुनता है, तो उसके मन में कई तरह के भाव एवं प्रश्न उत्पन्न होने लगते हैं। उसे ऐसा लगता है कि कोयल उसके लिए कोई संदेश लेकर आयी है, कोई प्रेरणा का स्रोत लेकर आयी है।
उससे इन प्रश्नों का बोझ सहा नहीं जाता और वह एक-एक कर के कोयल से सारे प्रश्न पूछने लगता है। वह सर्वप्रथम कोयल से पूछता है कि तुम क्या गा रही हो? फिर गाते-गाते तुम बीच-बीच में चुप क्यों हो जाती हो। वो कोयल से कहता है – हे कोयल! ज़रा बताओ तो, क्या तुम मेरे लिए कोई संदेश लेकर आयी हो? अगर कोई संदेश लेकर आयी हो, तो उसे कहते-कहते चुप क्यों हो जा रही हो और यह संदेश तुम्हें कहाँ से मिला है, ज़रा मुझे बताओ।
ऊँची काली दीवारों के घेरे में,
डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,
जीने को देते नहीं पेट-भर खाना
मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना!
जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,
शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?
हिमकर निराश कर चला रात भी काली,
इस समय कालिमामयी जगी क्यूँ आली?
कैदी और कोकिला भावार्थ :- इन पंक्तियों में कवि ने अंग्रेज़ों के अत्यचार एवं उनके काले कारनामों को जनता के सामने प्रस्तुत किया है। पराधीन भारत में, जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानी जेल के अंदर होने वाले अत्याचार एवं अपनी दयनीय स्थिति का वर्णन करते हुए कहता है कि उन्हें जेल के अंदर अंधकार में काली और ऊँची दीवारों के बीच डाकू, चोरों-उचक्कों के साथ रहना पड़ रहा है। जहाँ उसका कोई मान सम्मान नहीं है।
जबकि स्वतंत्रता सेनानियों के साथ इस तरह का बर्ताव नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें जीने के लिए पेट-भर खाना भी नहीं दिया जाता और ना ही उन्हें मरने दिया जाता है। यानि कि उन्हें तड़पा-तड़पा कर जीवित रखना ही प्रशासन का उद्देश्य है। इस प्रकार उनकी स्वतंत्रता पूरी तरह से छीन ली गई है और उनके ऊपर रात-दिन कड़ा पहरा लगा होता है।
अंग्रेजी शासन उनके साथ घोर अन्याय कर रहा है और अंग्रेज़ों के राज में स्वतंत्रता सेनानी को आकाश में भी घोर अंधकार रूपी निराशा दिख रही है, जहाँ न्याय रूपी चंद्रमा का थोड़ा-सा भी प्रकाश नहीं है। इसलिए स्वतंत्रता सेनानी के माध्यम से कवि कोयल से पूछता है – हे कोयल! इतनी रात को तू क्यों जाग रही है और दूसरों को क्यों जगा रही है? क्या तू कोई संदेश लेकर आयी है?
क्यों हूक पड़ी?
वेदना बोझ वाली-सी;
कोकिल बोलो तो!
क्या लुटा?
मृदुल वैभव की
रखवाली-सी,
कोकिल बोलो तो!
कैदी और कोकिला भावार्थ :- इन पंक्तियों में कवि ने कोयल के स्वर में निहित वेदना को बोझ के सामान बताकर, पराधीन भारतवासियों के मन में छुपी वेदना की तरफ इशारा किया है। जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानी कोयल की आवाज़ में दर्द का अनुभव करता है। उसे ऐसा लगता है कि कोयल ने अँग्रेज़ सरकार द्वारा किये जाने वाले अत्याचार को देख लिया है। इसीलिए उसके कंठ से मीठी एवं मधुर ध्वनि के बजाय वेदना का स्वर सुनाई पड़ रहा है, जिसमें कोयल के दर्द की हूक शामिल है। कवि के अनुसार कोयल अपनी वेदना सुनाना चाहती है।
इसीलिए कवि कोयल से पूछ रहा है – कोयल! बोलो तो तुम्हारा क्या लूट गया है, जो तुम्हारे कंठ से वेदना की ऐसी हूक सुनाई पड़ रही है? कोयल तो सबसे मीठी एवं सुरीली आवाज के लिए विख्यात है, जिसे गाते हुए सुनकर कोई भी मनुष्य प्रसन्न हो उठता है। लेकिन, जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानी को कोयल की आवाज़ ना तो सुरीली लगी और न ही मीठी लगी, बल्कि उसे कोयल की आवाज़ में दुःख और वेदना की अनुभूति हुई। इसीलिए वह व्याकुल हो उठा और कोयल से बार-बार पूछने लगा कि बताओ कोयल तुम्हारे ऊपर क्या विपदा आई है?।
क्या हुई बावली?
अर्ध रात्रि को चीखी,
कोकिल बोलो तो!
किस दावानल की
ज्वालायें हैं दीखी?
कोकिल बोलो तो!
कैदी और कोकिला भावार्थ :- स्वतंत्रता सेनानी को कोयल का इस तरह अंधकार से भरी आधी रात में गाना (चीखना), बड़ा ही अस्वाभाविक लगा। इसी वजह से उसने कोयल को बावली कहते हुए उससे पूछा है कि तुम्हें क्या हुआ है? तुम इस तरह आधी रात में क्यों चीख रही हो? क्या तुमने जंगल में लगी हुई आग देख ली है? यहाँ पर कवि ने जंगल की भयावह आग के रूप में अंग्रेज़ी सरकार की यातनाओं की तरफ इशारा किया है। उन्हें ऐसा लग रहा है कि कोयल ने अंग्रेज़ी सरकार की हैवानियत देख ली है, इसलिए वह चीख-चीख कर ये बात सबको बता रही है।
क्या? -देख न सकती जंजीरों का गहना?
हथकड़ियाँ क्यों? ये ब्रिटिश-राज का गहना,
कोल्हू का चर्रक चूँ?- जीवन की तान,
गिट्टी पर अंगुलियों ने लिखे गान!
हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ,
खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूँआ।
दिन में करुणा क्यों जगे, रुलानेवाली,
इसलिए रात में गज़ब ढा रही आली?
कैदी और कोकिला भावार्थ :- कवि को यह लगता है कि कोयल उसे जंजीरों में बंधा हुआ देखकर यूँ चीख पड़ी है। इसलिए कैदी कोयल से कहता है – क्या तुम हमें इस तरह जंजीरों में लिपटे हुए नहीं देख सकती हो? अरे ये तो अंग्रेज़ी सरकार द्वारा हमें दिया गया गहना है। अब तो कोल्हू चलने की आवाज हमारे जीवन का प्रेरणा-गीत बन गया है। दिन-भर पत्थर तोड़ते-तोड़ते हम उन पत्थरों पर अपनी उंगलियों से भारत की स्वतंत्रता के गान लिख रहे हैं। हम अपने पेट पर रस्सी बांध कर कोल्हू का चरसा चला-चला कर, ब्रिटिश सरकार की अकड़ का कुआँ खाली कर रहे हैं।
अर्थात् हम इतनी यातनाएं सहने और भूखे रहने के बाद भी अंग्रेज़ी शासन के सामने नहीं झुक रहे हैं, जिससे उनकी अकड़ ज़रूर कम हो जाएगी। इसी वजह से दिन में हमारे अंदर यातनाओं को सहने के लिए ग़जब का आत्मबल आ जाता है, जिससे हमारे अंदर कोई करुणा उत्पन्न नहीं होती और ना ही हम रोते हैं। शायद तुम्हें यह बात पता चल गई है, इसीलिए शायद तुम मुझे रात में सांत्वना देने आयी हो। परन्तु, तुम्हारे इस वेदना भरे स्वर ने मेरे ऊपर ग़जब ढा दिया है और मेरे मन को व्याकुल कर दिया है।
इस शांत समय में,
अंधकार को बेध, रो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो!
चुपचाप, मधुर विद्रोह-बीज
इस भाँति बो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो!
कैदी और कोकिला भावार्थ :- आगे कवि कोयल से कहता है कि इस आधी-रात्रि में तुम अँधेरे को चीरते हुए इस तरह क्यों रो रही हो? कोयल बोलो तो, क्या तुम हमारे अंदर अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह के बीज बोना चाहती हो? इस तरह कवि ने जेल में कैद एक स्वतंत्रता सेनानी के मन की दशा का वर्णन किया है कि किस प्रकार कोयल यह गीत गा-गा कर भारतीयों में देश-प्रेम एवं देशभक्ति की भावना को मजबूत बनाना चाहती है, ताकि वे अंग्रेजों की परतंत्रता से मुक्ति पा सकें।
काली तू, रजनी भी काली,
शासन की करनी भी काली,
काली लहर कल्पना काली,
मेरी काल कोठरी काली,
टोपी काली, कमली काली,
मेरी लौह-श्रृंखला काली,
पहरे की हुंकृति की ब्याली,
तिस पर है गाली, ऐ आली!
कैदी और कोकिला भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने अंग्रेज़ी शासन-काल के दौरान जेलों में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ हो रहे घोर अत्याचार का वर्णन किया है। काले रंग को हमारे समाज में फैले दुःख और अशांति का प्रतीक माना गया है। इसीलिए कवि ने यहाँ हर चीज को काला बताया है। कवि कैदी के माध्यम से कह रहा है कि कोयल तू खुद काली है, ये रात भी घोर काली है और ठीक इसी तरह अंग्रेज़ी सरकार द्वारा की जाने वाली सारी करतूतें भी काली है और जेल की काली चारदीवारी में चलने वाली हवा भी काली है।
मैंने जो टोपी पहनी हुई है, वह भी काली है और जो कम्बल मैं ओढ़ता हूँ वह भी काला है। मैंने जो लोहे की जंजीरें पहन रखी हैं, वह भी काली है और इसी वजह से हमारे अंदर आने वाली कल्पनाएं भी काली हो गई हैं। इतनी यातनाओं को सहने के बाद, हमें हमारे ऊपर दिन-भर नजर रखने वाले पहरेदारों की हुंकार और गाली भी सुननी पड़ती हैं। जो किसी काले सांप की भाँति हमें डँसने को दौड़ती हैं।
इस काले संकट-सागर पर
मरने की, मदमाती!
कोकिल बोलो तो!
अपने चमकीले गीतों को
क्योंकर हो तैराती!
कोकिल बोलो तो!
कैदी और कोकिला भावार्थ :- कवि यह नहीं समझ पा रहा है कि कोयल स्वतंत्र होने के बाद भी इस अँधेरी आधी रात में कारागार के ऊपर मंडराकर अपनी मधुर आवाज़ में गीत क्यों गा रही है। क्या वह इस संकट में खुद को इसलिए ले आयी है कि उसने मरने की ठान ली है। इसका कोई लाभ होने वाला नहीं है। इसलिए कैदी कोयल से पूछ रहा है – हे कोयल! बताओ तुम क्यों इस विपरीत परिस्थिति में आज़ादी की भावना जगाने वाले गीत गा रही हो?
तुझे मिली हरियाली डाली,
मुझे मिली कोठरी काली!
तेरा नभ-भर में संचार
मेरा दस फुट का संसार!
तेरे गीत कहावें वाह,
रोना भी है मुझे गुनाह!
देख विषमता तेरी-मेरी,
बजा रही तिस पर रणभेरी!
कैदी और कोकिला भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने स्वतंत्र कोयल एवं बंदी कैदी की मनःस्थिति की तुलना बड़े ही मार्मिक ढंग से की है। जहाँ एक ओर कोयल पूरी तरह से स्वतंत्र, किसी भी पेड़ की डाली में जाकर बैठ सकती है। कहीं पर भी विचरण कर सकती है और अपने मनचाहे गीत गा सकती है। वहीँ दूसरी ओर कैदी के लिए अंधकार से भरी 10 फुट की जेल की चारदीवारी है। जिसमें उसे अपना जीवन बिताना है, वह वहाँ अपनी इच्छानुसार कुछ भी नहीं कर सकता।
कोयल के मधुर गान को सुनकर सब लोग वाह-वाह करते हैं। वहीँ किसी कैदी के रोने को कोई सुनता तक नहीं है। इस प्रकार, कैदी और कोयल की परिस्थिति में ज़मीन-आसमान का फर्क है, मगर, फिर भी कोयल युद्ध का संगीत क्यों बजा रही है? कैदी कोयल से जानना चाहता है कि आखिर कोयल के इस तरह रहस्यमय ढंग से गाने का क्या मतलब है?
इस हुंकृति पर,
अपनी कृति से और कहो क्या कर दूँ?
कोकिल बोलो तो!
मोहन के व्रत पर,
प्राणों का आसव किसमें भर दूँ!
कोकिल बोलो तो!
कैदी और कोकिला भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने कोयल और कैदी दोनों के अंदर स्वतंत्रता की प्रबल भावना को दिखाया है। जहां कोयल अपने जोशीले गान से देशवासियों में विद्रोह को जागृत कर रही है, वहीं कैदी स्वंत्रता के लिए लगातार अंग्रेज़ी सरकार की यातनायें सहन कर रहा है। इसीलिए कवि ने यहाँ कोयल की आवाज को कैदी के लिए आजादी का संदेश बताया है। जिसे सुनकर कैदी कुछ भी करने के लिए तैयार हो सकता है।
इसलिए इन पंक्तियों में कैदी कोयल से पूछ रहा है कि हे कोयल! मुझे बता कि मैं गांधी जी द्वारा चलाये जा रहे इस स्वतंत्रता संग्राम में किस तरह अपने प्राण झोंक दूँ? मैं तम्हारे संगीत को सुनकर अपनी रचनाओं के द्वारा क्रान्ति की ज्वाला भड़काने वाली अग्नि तो पैदा कर रहा हूँ, लेकिन तुम मुझे बताओ कि मैं देश की आज़ादी के लिए और क्या कर सकता हूँ?
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
प्रश्न 1.
कोयल की कूक सुनकर कवि की क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर-
कोयल की कूक सुनकर कवि को लगा कि वह मानो उसे कुछ कहना चाहती है। या तो वह उसे निरंतर लड़ते रहने की प्रेरणा देना चाहती है या उसकी यातनाओं के दर्द को बाँटना चाहती है। उसे लगता है कि कोकिल कवि के कष्टों को देखकर आँसू बहा रही है और चुपचाप अँधेरे को बेधकर विद्रोह की चेतना जगा रही है। इसलिए अंत में कवि उसके इशारों पर आत्म-बलिदान करने को तैयार हो जाता है।
प्रश्न 2.
कवि ने कोकिल के बोलने के किन कारणों की संभावना बताई?
उत्तर-
कवि ने कोकिल के बोलने पर निम्नलिखित कारणों की संभावना जताई है-कोयल जेल में बंद क्रांतिकारियों को देशवासियों की दुर्दशा के बारे में बताने आयी है।
कोयल कैदी क्रांतिकारियों को धैर्य बँधाने एवं दिलासा देने आई है।
कोयल कैदी क्रांतिकारियों के दुखों पर मरहम लगाने आई है।
कोयल पागल हो गई है जो आधी रात में चीख रही है।
प्रश्न 3.
किस शासन की तुलना तम के प्रभाव से की गई है और क्यों?
उत्तर-
ब्रिटिश शासन की तुलना तम के प्रभाव से की गई है।
क्यों ब्रिटिश शासकों ने बेकसूर भारतीयों पर घोर अत्याचार किए। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को कारागृह में तरह-तरह की यातनाएँ दीं। उन्हें कोल्हू के बैल की तरह जोता गया।
प्रश्न 4.
कविता के आधार पर पराधीन भारत की जेलों में दी जाने वाली यंत्रणाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
पराधीन भारत की जेलों में भारतीयों को पशुओं की भाँति-रखा जाता था। उन्हें ऐसी यातनाएँ दी जाती थीं कि सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं-उन्हें ऊँची-ऊँची दीवार वाली जेलों में रखा जाता था।
उन्हें दस फुट की छोटी-छोटी कोठरियों में रखा जाता था।
उन्हें भरपेट खाना नहीं दिया जाता था।
उनके साथ पशुओं-सा व्यवहार किया जाता था।
उन्हें बात-बात पर गालियाँ दी जाती थीं।
उन्हें तड़प-तड़पकर मरने के लिए छोड़ दिया जाता था।
प्रश्न 5.
भाव स्पष्ट कीजिए
(क) मृदुल वैभव की रखवाली-सी, कोकिल बोलो तो!
(ख) हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ, खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कुँआ।
उत्तर-
(क) कवि के अनुसार, वैसे तो संसार में कष्ट-ही-कष्ट हैं। यदि कहीं कुछ मृदुलता और सरसता बची है तो वह कोयल के मधुर स्वर में बची है। अतः कोयल मृदुलता की रखवाली करने वाली है। वह उससे पूछता है कि आखिर वह जेल में अपना मधुर स्वर गुँजाकर उसे क्या कहना चाहती है!
(ख) इसमें जेल की असहनीय यातनाएँ झेलता हुआ कवि स्वाभिमानपूर्वक कहता है कि वह अपने पेट पर कोल्हू का जूआ बाँधकर चरसा चला रहा है। आशय यह है कि उससे पशुओं जैसा सख्त काम लिया जा रहा है। फिर भी वह हार नहीं मान रहा। इससे ब्रिटिश सरकार की अकड़ ढीली पड़ रही है। अंग्रेज़ों को बोध हो गया है कि अब अत्याचार करने से भी वे सफल नहीं हो सकते।
प्रश्न 6.
अर्धरात्रि में कोयल की चीख से कवि को क्या अंदेशा है?
उत्तर-
आधी रात में कोयल की चीख सुनकर कवि को यह अंदेशा होता है कि उसने भारतीयों के आक्रोश एवं असंतोष की ज्वाला देख ली होगी। यह ज्वाला जंगल में लगने वाली आग के समान भयंकर रही होगी। कोयल उसी ज्वाला (क्रांति) की सूचना देने जेल परिसर के पास आई है।
प्रश्न 7.
कवि को कोयल से ईष्र्या क्यों हो रही है?
उत्तर-
कवि को कोयल से इसलिए ईर्ष्या हो रही है क्योंकि कोयल स्वतंत्र है, जबकि कवि बंदी है। कोयल हरियाली का आनंद ले रही है, जबकि कवि दस फुट की अँधेरी कोठरी में जीने के लिए विवश है। कोयल के गान की सभी सराहना करते हैं, जबकि कवि के लिए रोना भी गुनाह हो गया है।
प्रश्न 8.
कवि के स्मृति-पटल पर कोयल के गीतों की कौन सी मधुर स्मृतियाँ अंकित हैं, जिन्हें वह अब नष्ट करने पर तुली है?
उत्तर-
कवि के स्मृति पटल पर कोयल की कर्णप्रिय अत्यंत मधुर स्वर की स्मृतियाँ अंकित हैं, जिन्हें अब वह नष्ट करने पर तुली है।
प्रश्न 9.
हथकड़ियों को गहना क्यों कहा गया है?
उत्तर-
गहना उस आभूषण को कहते हैं, जो धारणकर्ता का गौरव और सौंदर्य बढ़ाए। पं. माखनलाल चतुर्वेदी जैसे क्रांतिकारी, जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए स्वयं प्रेरणा से संघर्ष का मार्ग अपनाया था, जेल को अपना प्रिय आवास तथा हथकड़ियों को गहना समझते थे। उन्हें किसी गलत कार्य के लिए हथकड़ी नहीं पहननी पड़ी। उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के महान उद्देश्य के लिए हथकड़ियाँ स्वीकार कीं, अतः उनसे उनका गौरव बढ़ा। समाज ने उन्हें उन हथकड़ियों के लिए प्रतिष्ठा दी। इसलिए उन्होंने हथकड़ियों को गहना कहा।
प्रश्न 10.
‘काली तू …. ऐ आली!’-इन पंक्तियों में ‘काली’ शब्द की आवृत्ति से उत्पन्न चमत्कार का विवेचन कीजिए।
उत्तर-
‘काली तू … ऐ आली!’ इन पंक्तियों में काली शब्द की आवृत्ति हुई है। इस शब्द का अर्थ भी उसके संदर्भानुसार है। संदर्भ के अनुसार काली शब्द के निम्नलिखित अनेक अर्थ हैं-हथकड़ियाँ रात, कोयल आदि का रंग काला बताने के लिए।
अंग्रेजों के अन्यायपूर्ण कारनामें बताने के लिए।
पराधीन भारतीयों का भविष्य अंधकारमय बताने के लिए।
अंग्रेज़ों के प्रति भारतीयों के मन में उठने वाले आक्रोश के संबंध में।
प्रश्न 11.
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
(क) किस दावानल की ज्वालाएँ हैं दीखीं?
(ख) तेरे गीत कहावें वाह, रोना भी है मुझे गुनाह!
देख विषमता तेरी-मेरी, बजा रही तिस पर रणभेरी!
उत्तर-
(क)
इस काव्य-पंक्ति में जेल की यातनाओं को दावानल की ज्वालाएँ कहा गया है। ब्रिटिश जेलों की असहनीय यातनाओं के लिए यह उपमान सटीक बन पड़ा है।
इसमें कोयल की कूक को चीख मानकर कवि उससे प्रश्न कर रहा है। कोयल का मानवीकरण प्रभावी बन पड़ा है।
दावानल की ज्वालाएँ में रूपकातिशयोक्ति तथा अनुप्रास अलंकार है।
प्रश्न शैली का प्रयोग प्रभावी बन पड़ा है।
(ख)इसमें कोयल की मधुर तान और जेल में बंद कवि की यातनाओं का तुलनात्मक वर्णन बहुत मार्मिक बन पड़ा है। कोयले सब जगह प्रशंसा पाती है, जबकि कवि के लिए रोना भी संभव नहीं है।
कोयल का मानवीकरण बहुत सुंदर बन पड़ा है। कवि को प्रतीत होता है कि कोयल रणभेरी बजाने वाली स्वतंत्रता-सेनानी है और अपनी कूक द्वारा संघर्ष की प्रेरणा दे रही है।
भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहमयी, संगीतात्मक तथा तुकांत है।
‘तेरी-मेरी’ में अनुप्रास और स्वरमैत्री का संगम है। रचना और अभिव्यक्ति
रचना एवं अभिव्यक्ति
प्रश्न 12.
कवि जेल के आसपास अन्य पक्षियों का चहकना भी सुनता होगा लेकिन उसने कोकिला की ही बात क्यों की है?
उत्तर-
अल्पपक्षियों का चहकना सुनकर भी कवि केवल कोयल से ही बातें करता है क्योंकि कोयले का स्वर अन्य पक्षियों की अपेक्षा मधुर एवं कर्णप्रिय होता है। कोयल ही आधी रात के सुनसान में केंक रही थी। कोयल की कैंक में ही उसे क्रांतिकारियों का संदेश होने की संभावना लगी।
प्रश्न 13.
आपके विचार से स्वतंत्रता सेनानियों और अपराधियों के साथ एक-सा व्यवहार क्यों किया जाता होगा?
उत्तर-
ब्रिटिश सरकार भारत की स्वतंत्रता के विरोध में थी। वह क्रांतिकारियों को दबाना चाहती थी। इसलिए वह उन्हें शारीरिक तथा मानसिक रूप से पीड़ित करती थी। उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने के लिए उन्हें चोरों, अपराधियों, बटमारों के साथ रखती थी तथा आम अपराधियों जैसा दुर्व्यवहार करती थी।
पाठेतर सक्रियता
प्रश्न 14.
पराधीन भारत की कौन-कौन सी जेलें मशहूर थीं, उनमें स्वतंत्रता सेनानियों को किस-किस तरह ही यातनाएँ दी जाती थीं? इस बारे में जानकारी प्राप्त कर जेलों की सूची एवं स्वतंत्रता सेनानियों के नामों को राष्ट्रीय पर्व पर भित्ति पत्रिका के रूप में प्रदर्शित करें।
उत्तर-
पराधीन भारत में निम्नलिखित जेलें मशहूर थीं-अंडमान निकोबार की जेल
पोरबंदर की जेल
इलाहाबाद की नैनी जेल
कोलकाता जेल
पूना की यरवदा जेल
इन जेलों में स्वतंत्रता सेनानियों को अमानवीय स्थितियों में रखा जाता था। उन्हें सीलन भरे छोटे-छोटे कमरे में रखा जाता था ताकि वे बीमार हो जाएँ। उन्हें पेटभर खाना नहीं दिया जाता था। उनसे जानवरों की भाँति काम करवाया जाता था। उन्हें बार-बात पर गालियाँ दी जाती थीं और मारा-पीटा जाता था। भित्ति पत्रिका पर प्रदर्शन का कार्य छात्र स्वयं करें।
प्रश्न 15.
स्वतंत्र भारत की जेलों में अपराधियों को सुधारक हृदय परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाता है। पता लगाइए कि इस दिशा में कौन-कौन से कार्यक्रम चह रहे हैं ?
उत्तर-स्वतंत्रता भारत की जेलों में अपराधियों को सुधार कर उनका हृदय परिवर्तन करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं; जैसे
उन्हें लघु एवं कुटीर उद्योगों का प्रशिक्षण दिया जाता है।
उन्हें नशा न करने की प्रेरणा देने हेतु नशा मुक्ति केंद्र चलाया जाता है।
उन्हें योग-व्यायाम आदि सिखाया जाता है।
उनकी शिक्षा का प्रबंध किया जाता है।
अनेक कार्यक्रमों के द्वारा उनका मनोरंजन किया जाता है।
समय-समय पर उनके लिए प्रवचन आयोजित किए जाते हैं।
अन्य पाठेतर हल प्रश्न
लघुउत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
‘जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है’-ऐसा किसने कहा है और क्यों?
उत्तर-
‘जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है’-ऐसा कवि ने कहा है क्योंकि कवि को स्वतंत्रता की माँग करने के कारण जेल में कैदकर दिया गया है। उसे वहाँ भरपेट भोजन नहीं दिया जाता है और मरने भी नहीं दिया जाता है। कवि एवं प्रसिद्ध क्रांतिकारियों की मृत्यु जेल में होने पर अंग्रेजों के विरुद्ध वातावरण बनने का भय था।
प्रश्न 2.
कवि को हिमकर किस तरह निराश कर चला गया?
उत्तर-
स्वतंत्रता सेनानी कवि को जेल में कैद कर दिया गया था। रात के सुनसान समय में वह चंद्रमा से बातें करते हुए उसके सहारे समय बिता रहा था परंतु रात बीतने से पहले ही चंद्रमा छिप गया। अब कवि अकेला पड़ गया। इस तरह हिमकर उसे निराश करके चला गया।
प्रश्न 3.
कवि ने किसकी वेदना को बोझ के समान बताया है और क्यों?
उत्तर-
कवि पराधीन भारत में रह रहे भारतीयों की वेदना को बोझ के समान बताया है क्योंकि पराधीन भारतीयों के साथ अंग्रेज़ नाना प्रकार की यंत्रनाएँ देते थे। वे निर्दोषों पर भी अत्याचार करते थे। अंग्रेजों का यह क्रूर व्यवहार भारतीयों की बोझ जैसी भारी वेदना बन गया था।
प्रश्न 4.
कोयल असमय चीख पड़ी थी। उसके इस प्रकार चीखने के कारणों के बारे में कवि क्या-क्या कल्पनाएँ करता है।
उत्तर-
कोयल के असमय चीखने के कारणों के बारे में कवि कई कल्पनाएँ करता है-कोयल ने भारतीय के आक्रोश रूपी दावनल की ज्वालाएँ देख ली हैं।
कोयल अपने जिस मृदुल वैभव की रखवाली कर रही थी, शायद वह लूट लिया गया।
प्रश्न 5.
ब्रिटिश राज का गहना किसे कहा गया है और क्यों? पठित पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
अंग्रेज़ सरकार ने क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में रखकर हथकड़ियाँ पहना दी थी। इन हथकड़ियों को ब्रिटिश राज का गहना कहा गया है। ये हथकड़ियाँ भारतमाता को आजाद कराने के पवित्र उद्देश्य को पूरा करते हुए मिली। थी, इसलिए इन्हें गहना कहा गया है।
प्रश्न 6.
कवि की अँगुलियाँ किस पर गाने लिख रही थीं और कैसे?
उत्तर-
पराधीन भारत की जेलों में बंद कैदियों से पशुओं के समान काम लिया जाता था। उनसे मोट से पानी खिंचवाने, गिट्टियाँ तोड़ने जैसा काम लिया जाता था। गिट्टियाँ तोड़ने से उठने वाली आवाज़ों को सुन कर लगता था कि ये कवि की अँगुलियों द्वारा लिखे गए गीत हैं।
प्रश्न 7.
‘तिस पर है गाली, ऐ आली!’ पंक्ति के आधार पर जेल के कर्मचारियों के व्यवहार का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
पराधीन भारत की जेलों में स्वतंत्रता की माँग करने वाले तथा क्रांतिकारियों के रूप में बंदी लोगों के साथ निर्मम व्यवहार किया जाता था। जेल के कर्मचारी उन्हें बात-बात पर गालियाँ देते थे और अपमानित करते थे। इस स्थिति में कैदी अपमान का चूंट पीकर रह जाते थे।
प्रश्न 8.
जेल में कवि के रोने को भी गुनाह क्यों माना जाता था?
उत्तर-
पराधीन भारत में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ अमानवीय व्यवहार किया था। वे निर्दोष भारतीयों को भी जेल में डाल देते थे। ऐसी ही दशा में स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाने वाले कवि को भी जेल में डाल दिया गया। यहाँ उसे रोने भी नहीं दिया जाता था। क्योंकि कवि का रोना सुनकर अन्य कैदियों के मन में कहीं उसके प्रति सहानुभूति और अंग्रेजों के प्रति आक्रोश भड़क सकता था।
प्रश्न 9.
जेल में कैदी के रूप में कवि को क्या-क्या काम करना पड़ा?
उत्तर-
कैदी के रूप में कवि को-पेट पर जूआ रखकर मोट खींचना पड़ा।
उसे पत्थर के टुकड़े तथा गिट्टियाँ तोड़नी पड़ीं।
बैलों की जगह कोल्हू में उसे जुतकर काम करना पड़ा।
प्रश्न 10.
‘कैदी और कोकिला’ कविता के आधार पर कोयल और कवि की स्थिति में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
कोयल और कवि की स्थिति में अंतर यह है कि-कोयल हरी-भरी डालियों पर कैंक-कूककर लोगों का ध्यान खींच रही है, जबकि कवि की किस्मत में जेल की काली कोठरी लिखी है।
कोयल आज़ादी से आकाश में उड़ती-फिर रही है जबकि कवि की दुनिया दस फुट की कोठरी में सिमटकर रह गई
कोयल के गीतों पर लोग वाह-वाह कह उठते हैं जबकि कवि का रोना भी अपराध समझा जाता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
कवि को जेल क्यों भेजा गया होगा, अपनी कल्पना के आधार पर लिखिए।
उत्तर-
स्वतंत्रता सभी को प्रिय होती है। कवि भी स्वतंत्र रहना चाहता था। दुर्भाग्य से उस समय देश अंग्रेज़ों का गुलाम था। कवि ने लोगों को अपनी खोई आज़ादी पाने की प्रेरणा देते हुए देश प्रेम बढाने एवं मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए अपना तन-मन-धन समर्पित करने वाली कविताएँ लिखी होंगी। यह बात अंग्रेज़ों को नागवार गुजरी और उन्होंने कवि की रचनाएँ जब्त कर ली होगी। उन्होंने कवि को ऐसी कविताएँ लिखने से मना किया होगा पर स्वाभिमानी कवि ने मौखिक रूप से लोगों में देश प्रेम जगाने तथा स्वतंत्रता की चिनकारी भड़काने का काम किया होगा। इससे क्रुद्ध अंग्रेजों ने कवि को जेल भेज दिया होगा।
प्रश्न 2.
अंग्रेजों ने कवि को बौधिक रूप से अशक्त करने का प्रयास क्यों किया और कैसे?
उत्तर-
अंग्रेजों की दृष्टि में आजादी की माँग करना सबसे बड़ा अपराध था। वे इसे राजद्रोह से कम नहीं समझे थे। ऐसे क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए वे तरह-तरह के हथकंडे अपनाते थे। कवि लेखक, एवं विचारशील लोगों के साथ वे इस तरह अत्याचार करते थे कि बौधिक रूप से कमज़ोर या अशक्त हो जाएँ और उनकी वैचारिक क्षमता शून्य हो जाय। उन्होंने कवि को जेल की उस कोठर में बंद कर दिया जिसमे डाकू, चोर, लुटेरे बटमार आदि बंद थे। ऐसे में कवि को विचारविमर्श करने के लिए ऐसे लोग मिलते थे जो चोरी-छीना झपटी से आगे की बात सोच ही नहीं सकते थे। इस तरह वे कवि को बौधिक रूप से अशक्त करने का प्रयास कर रहे थे।
प्रश्न 3.
‘मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना’ के आलोक में बताइए कि अंग्रेज़ कवि जैसे कैदियों को मरने भी नहीं देते थे, क्यों?
उत्तर-
पराधीन भारत की जेलों में बंद स्वतंत्रता सेनानियों एवं क्रांतिकारियों पर अंग्रेज़ तरह-तरह के अत्याचार करते थे। उन्हें बैलों की जगह कोल्हू चलाने और मोट खींचने जैसे काम करने को विवश कर देते थे। ऐसे कठोर शारीरिक श्रम के बाद भी वे न उन्हें पेट भर खाना देते थे और न मरने देते थे। कवि जैसे कैदियों को न मरने देने का कारण यह था कि ये क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी अपने कार्यों से प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय होते थे। जेल में इनकी मृत्यु होने पर भारतीय जन का आक्रोश भड़क सकता था, जिसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता था। ऐसे में उनके विरुद्ध घृणा का वातावरण बनने का भय था।

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