9. क्षितिज भाग - 1, 13. ग्राम श्री (सुमित्रानंदन पंत)


सुमित्रानंदन पन्त का जीवन परिचय- : सुमित्रानंदन पंत हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख कवियों में से एक है। इनका जन्म उत्तरांचल के अल्मोड़ा जिले में कौसानी गांव में सन 1900 में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में ही हुई। 1918 में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण कर, वे इलाहाबाद चले गए। 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी द्वारा भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर, उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का अध्ययन करने लगे। उनकी मृत्यु 28 दिसम्बर 1977 को हुई।


सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था। 1926-27 में उनका प्रसिद्ध काव्य-संकलन ‘पल्लव’ प्रकाशित हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य-कृतियाँ हैं – ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि।

हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी, तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। जहां उनकी प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र मिलते हैं, वहीं दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाएं व कोमल भावनाएं देखने को मिलती हैं।


उनके अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता के भावों की अभिव्यक्ति के लिए सटीक शब्दों के चयन के कारण उन्हें शब्द-शिल्पी कवि भी कहा जाता है।

– ग्राम श्री कविता का सार : ग्राम श्री कविता में कवि ने गांव के प्राकृतिक सौंदर्य का बड़ा ही मनोहर वर्णन किया है। हरे-भरे खेत, बगीचे, गंगा का तट, सभी कवि की इस रचना में जीवित हो उठे हैं। अगर आपने अपने जीवन-काल में कभी भी गांव की सुषमा और समृद्धि का दृश्य नहीं देखा है, तब भी आप इस कविता को पढ़ कर ये कल्पना कर सकते हैं कि वह कैसा प्रतीत होता होगा। खेतों में उगी फसल आपको ऐसी लगेगी, मानो दूर-दूर तक हरे रंग की चादर बिछी हुई हो। उस पर ओस की बूँदें गिरने के बाद जब सूरज की किरणें पड़ती हैं, तो वह चाँदी की तरह चमकती है।

नए उगते हुए गेहूँ, जौ, सरसों, मटर इत्यादि को देख कर ऐसा प्रतीत होता है, मानो प्रकृति ने श्रृंगार किया है। आम के फूल, जामुन के फूल की सुगंध पूरे गांव को महका रही है। गंगा के किनारे का दृश्य भी इतना ही मनमोहक है। जल-थल में रहने वाले जीव अपने-अपने कार्य में लगे हुए हैं। जैसे कि बगुला नदी के किनारे मछलियाँ पकड़ते हुए खुद को सँवार रहा है। इस तरह कवि अपनी इस कविता के माध्यम से हमें गांव के अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के बारे में बता रहे हैं।

ग्राम श्री- सुमित्रानंदन पंत

फैली खेतों में दूर तलक
मखमल की कोमल हरियाली,
लिपटीं जिससे रवि की किरणें
चाँदी की सी उजली जाली!
तिनकों के हरे हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक,
श्यामल भू तल पर झुका हुआ
नभ का चिर निर्मल नील फलक!

रोमांचित सी लगती वसुधा
आई जौ गेहूँ में बाली,
अरहर सनई की सोने की
किंकिणियाँ हैं शोभाशाली!
उड़ती भीनी तैलाक्त गंध
फूली सरसों पीली पीली,
लो, हरित धरा से झाँक रही
नीलम की कलि, तीसी नीली!


रंग रंग के फूलों में रिलमिल
हंस रही सखियाँ मटर खड़ी,
मखमली पेटियों सी लटकीं
छीमियाँ, छिपाए बीज लड़ी!
फिरती है रंग रंग की तितली
रंग रंग के फूलों पर सुंदर,
फूले फिरते ही फूल स्वयं
उड़ उड़ वृंतों से वृंतों पर!

अब रजत स्वर्ण मंजरियों से
लद गई आम्र तरु की डाली,
झर रहे ढ़ाक, पीपल के दल,
हो उठी कोकिला मतवाली!
महके कटहल, मुकुलित जामुन,
जंगल में झरबेरी झूली,
फूले आड़ू, नीम्बू, दाड़िम
आलू, गोभी, बैगन, मूली!

पीले मीठे अमरूदों में
अब लाल लाल चित्तियाँ पड़ीं,
पक गये सुनहले मधुर बेर,
अँवली से तरु की डाल जड़ी!
लहलह पालक, महमह धनिया,
लौकी औ’ सेम फलीं, फैलीं
मखमली टमाटर हुए लाल,
मिरचों की बड़ी हरी थैली!


बालू के साँपों से अंकित
गंगा की सतरंगी रेती
सुंदर लगती सरपत छाई
तट पर तरबूजों की खेती;
अँगुली की कंघी से बगुले
कलँगी सँवारते हैं कोई,
तिरते जल में सुरखाब, पुलिन पर
मगरौठी रहती सोई!

हँसमुख हरियाली हिम-आतप
सुख से अलसाए-से सोये,
भीगी अँधियाली में निशि की
तारक स्वप्नों में-से खोये-
मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम-
जिस पर नीलम नभ आच्छादन-
निरुपम हिमांत में स्निग्ध शांत
निज शोभा से हरता जन मन!

ग्राम श्री कविता का भावार्थ – 

फैली खेतों में दूर तलक
मखमल की कोमल हरियाली,
लिपटीं जिससे रवि की किरणें
चाँदी की सी उजली जाली!
तिनकों के हरे हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक,
श्यामल भू तल पर झुका हुआ
नभ का चिर निर्मल नील फलक!

ग्राम श्री भावार्थ :- ग्राम श्री कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में कवि सुमित्रानंदन पंत जी ने हरी-भरी धरती के प्राकृतिक सौंदर्य का बड़ा ही मनोरम चित्रण किया है। गांव में चारों तरफ हरियाली फैली हुई है और जब सुबह-सुबह इस पर ओस की बूँदें गिरती हैं और सूर्योदय के बाद जब सूर्य की किरणें इन बूंदो पर पड़ती हैं, तो सारा वातावरण झिलमिल-झिलमिल चमक उठता है। ऐसा प्रतीत होता है कि खेत की हरियाली के ऊपर चाँदी की एक चादर बिछी हुई है।


नए उगे हुए हरे पत्तों पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है, मानो सूर्य की किरणें उनके आर-पार चली जा रही हैं और उनके अंदर स्थित हरे रंग का खून स्पष्ट दिखाई दे रहा है। जब हम दूर से इस वातावरण को निहारने लगते हैं, तो हमें ऐसा प्रतीत होता है कि नीले रंग का आकाश झुक कर खेतों की हरियाली के ऊपर अपना आँचल बिछा रहा है।


रोमांचित सी लगती वसुधा
आई जौ गेहूँ में बाली,
अरहर सनई की सोने की
किंकिणियाँ हैं शोभाशाली!
उड़ती भीनी तैलाक्त गंध
फूली सरसों पीली पीली,
लो, हरित धरा से झाँक रही
नीलम की कलि, तीसी नीली!

ग्राम श्री भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने फ़सलों से लदी हुई धरती की सुंदरता का वर्णन बड़े ही रोमांचक ढंग से किया है। खेतों में जौ और गेहूँ की फ़सल उगने से धरती बहुत ही रोमांचित लग रही है। अरहर और सनई की फसलें सोने की करघनी जैसी लग रही हैं, जो धरती रूपी युवती की कमर में बंधी हुई है और हवा चलने से हिल-हिल कर मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रही है। सरसों के फूलों के खिल जाने से पूरे वातावरण में एक ख़ुशबू बह रही है, जो धरती की प्रसन्नता को दर्शा रही है। इस हरी-भरी धरती की सुंदरता को बढ़ाने के लिए, अब तीसी के नीले फूल भी अपना सर उठाकर झांक रहे हैं। इस प्रकार खेतों में गेहूं, जौ की बालियाँ, अरहर और सनई की फलियाँ, सरसों के पीले फूल एवं अलसी की कालियाँ धरती का सौंदर्य बढ़ा रही हैं।



रंग रंग के फूलों में रिलमिल
हंस रही सखियाँ मटर खड़ी,
मखमली पेटियों सी लटकीं
छीमियाँ, छिपाए बीज लड़ी!
फिरती है रंग रंग की तितली
रंग रंग के फूलों पर सुंदर,
फूले फिरते ही फूल स्वयं
उड़ उड़ वृंतों से वृंतों पर!

ग्राम श्री भावार्थ :- ग्राम श्री कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने खेत में रंग-बिरंगे फूलों और तितलियों की सुंदरता का वर्णन किया है। विभिन्न रंगों के फूलों के बीच खड़ी मटर की फसल हँस रही है, जैसे कोई सखी जब सज-धज कर तैयार होती है, तो सारी सखियाँ उसे देखकर मुस्कुराने लगती हैं। इन्हीं के बीच फ़सलों की बीज से लदी लड़ियाँ खड़ी हुई हैं। इन सब के बीच, कई तरह की रंग-बिरंगी तितलियां एक फूल से दूसरे फूल तक उड़-उड़ कर जा रही हैं। यह दृश्य ऐसा लग रहा है, मानो ख़ुद फूल ही उड़ उड़ कर दूसरे फूलों तक जा रहे हैं। इस तरह प्रस्तुत पंक्तियों में कवि की कल्पना सजग हो उठी है, जिसमें उन्होंने रंगों से भरे प्राकृतिक वातावरण का बड़ा ही मनभावन चित्रण किया है।

अब रजत स्वर्ण मंजरियों से
लद गई आम्र तरु की डाली,
झर रहे ढ़ाक, पीपल के दल,
हो उठी कोकिला मतवाली!
महके कटहल, मुकुलित जामुन,
जंगल में झरबेरी झूली,
फूले आड़ू, नीम्बू, दाड़िम
आलू, गोभी, बैगन, मूली!

ग्राम श्री भावार्थ :- कवि ने ग्राम श्री कविता की इन पंक्तियों में वसंत-ऋतू का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है। कवि कहता है कि आम के पेड़ों की डालियाँ सुनहरी और चाँदनी रंग की आम की बौर (कलियों) से लद चुकी हैं। पतझड़ के कारण ढाक और पीपल के पेड़ की पत्तियाँ झड़ रही हैं। इन सब से कोयल मतवाली होकर मधुर संगीत सुना रही है। पूरे वातावरण में कटहल की महक को महसूस किया जा सकता है और आधे पक्के-आधे कच्चे जामुन तो देखते ही बनते हैं। झरबेरी बेरों से लद चुकी है। खेतों में कई तरह के फल एवं सब्ज़ियाँ उग चुकी हैं, जैसे आड़ू, नींबू, अनार, आलू, गोभी, बैंगन, मूली इत्यादि।


पीले मीठे अमरूदों में
अब लाल लाल चित्तियाँ पड़ीं,
पक गये सुनहले मधुर बेर,
अँवली से तरु की डाल जड़ी!
लहलह पालक, महमह धनिया,
लौकी औ’ सेम फलीं, फैलीं
मखमली टमाटर हुए लाल,
मिरचों की बड़ी हरी थैली!

ग्राम श्री भावार्थ :- वसंत ऋतू होने के कारण अमरुद के पेड़ों पर फल पक चुके हैं और उनपर लाल लाल निशान भी दिखाई दे रहे हैं। ये इस बात का संकेत है कि अमरुद मीठे हो चुके हैं। बैर भी पक कर सुनहरे रंग के हो गए हैं। आवंले के फल से पूरी डाल ऐसी लदी हुई है, जैसे किसी गहने में मोती जड़े हों। पालक पूरे खेत में लहलहा रहा है और धनिये की सुगंध तो पूरे वातावरण में फैली हुई है। लौकी और सेम की लताएं पूरे खेतों में फ़ैल गई हैं। टमाटर पक कर लाल हो चुके हैं, मानो जैसे ज़मीन पर मखमल बिछा हुआ हो। पेड़ों पर लगी हरी मिर्चों के गुच्छे किसी बड़ी हरी थैली की तरह लग रहे हैं।

बालू के साँपों से अंकित
गंगा की सतरंगी रेती
सुंदर लगती सरपत छाई
तट पर तरबूजों की खेती;
अँगुली की कंघी से बगुले
कलँगी सँवारते हैं कोई,
तिरते जल में सुरखाब, पुलिन पर
मगरौठी रहती सोई!

ग्राम श्री भावार्थ :- ग्राम श्री कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में गंगा-तट के सौंदर्य का वर्णन किया गया है। कवि सुमित्रानंदन पंत जी के अनुसार, गंगा के किनारे रेत टेढ़ी-मेड़ी कुछ इस तरह फैली हुई है, जैसे कोई सांप बालू पर अपने निशान छोड़ गया हो। उस रेत पर पड़ती सूर्य की किरणें रंगबिरंगी नजर आ रही है। गंगा के तट पर बिछी घास और तरबूजों की खेती बहुत ही सुन्दर दिखाई पड़ रही है। गंगा के तट पर शिकार करते बगुले अपने पंजों से कलँगी को ऐसे सँवार रहे हैं, मानो वे कंघी कर रहे हों। सुरखाब या चक्रवाक (चकवा) पक्षी जल में तैर रहे हैं और मगरैठी पक्षी आराम से सोए हुए हैं।

हँसमुख हरियाली हिम-आतप
सुख से अलसाए-से सोये,
भीगी अँधियाली में निशि की
तारक स्वप्नों में-से खोये-
मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम-
जिस पर नीलम नभ आच्छादन-
निरुपम हिमांत में स्निग्ध शांत
निज शोभा से हरता जन मन!

ग्राम श्री भावार्थ :- ग्राम श्री कविता की अंतिम पंक्तियों में कवि ने गांव की हरियाली, शांति एवं प्राकृतिक सौंदर्य का बड़ा ही सरल वर्णन किया है। उनके अनुसार, सर्दी की धूप में जब सूर्य की किरणें खेतों की हरियाली पर पड़ती हैं, तो वो इस तरह चमक उठती हैं, मानो वो खुशी से झूम रही हों। कवि को ये दोनों आलस्य से भरे सोये हुए प्रतीत होते हैं। सर्दी की रातें ओस के कारण भीगी हुई जान पड़ रही हैं, जिनमें तारे मानो किसी सपने में खोये हुए लग रहे हैं। इस वातावरण में पूरा गांव किसी रत्न की तरह लग रहा है, जिसे आकाश ने नीले रंग की चादर ओढ़ा रखी हो। इस प्रकार शरद ऋतू के अंतिम कुछ दिनों में गांव के वातावरण में अनुपम शांति की अनुभूति हो रही है, जिससे गांव के सभी लोग बहुत प्रभावित हैं।




पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न 1.
कवि ने गाँव को ‘हरता जन-मन’ क्यों कहा है?
उत्तर-
कवि ने गाँव को ‘हरता जन-मन’ इसलिए कहा है क्योंकि उसकी शोभा अनुराग है। खेतों में दूर-दूर तक मखमली हरियाली फैली हुई है। उस पर सूरज की धूप चमक रही है। इस शोभा के कारण पूरी वसुधा प्रसन्न दिखाई देती है। इसके कारण गेहूँ, जौ, अरहर, सनई, सरसों की फसलें उग आई हैं। तरह-तरह के फूलों पर रंगीन तितलियाँ मँडरा रही हैं। आम, बेर, आड़, अनार आदि मीठे फल पैदा होने लगे हैं। आलू, गोभी, बैंगन, मूली, पालक, धनिया, लौकी, सेम, टमाटर, मिर्च आदि खूब फल-फूल रहे हैं। गंगा के किनारे तरबूजों की खेती फैलने लगी है। पक्षी आनंद विहार कर रहे हैं। ये सब दृश्य मनमोहक बन पड़े हैं। इसलिए गाँव सचमुच जन-मन को हरता है।

प्रश्न 2.
कविता में किस मौसम के सौंदर्य का वर्णन है?
उत्तर-
कविता में सरदी के मौसम के सौंदर्य का वर्णन है। इसी समय गुलाबी धूप हरियाली से मिलकर हरियाली पर बिछी चाँदी की उजली जाली का अहसास कराती है और पौधों पर पड़ी ओस हवा से हिलकर उनमें हरारक्त होने का भान होता है। इसके अलावा खेत में सब्ज़ियाँ तैयार होने, पेड़ों पर तरह-तरह के फल आने, तालाब के किनारे रेत पर मँगरौठ नामक पक्षी के अलसीकर सोने से पता चलता है कि यह सरदी के मौसम का ही वर्णन है।


प्रश्न 3.
गाँव को ‘मरकत डिब्बे-सा खुला’ क्यों कहा गया है?
उत्तर-
गाँव में चारों ओर मखमली हरियाली और रंगों की लाली छाई हुई है। विविध फसलें लहलहा रही हैं। वातावरण मनमोहक सुगंधों से भरपूर है। रंगीन तितलियाँ उड़ रही हैं। चारों ओर रेशमी सौंदर्य छाया हुआ है। सूरज की मीठी-मीठी धूप इस सौंदर्य को और जगमगा रही है। इसलिए इस गाँव की तुलना मरकत डिब्बे से की गई है।


प्रश्न 4.
अरहर और सनई के खेत कवि को कैसे दिखाई देते हैं?
उत्तर-
अरहर और सनई फलीदार फ़सलें हैं। इनकी फ़सलें पकने पर, जब हवा चलती है तो इनमें से मधुर आवाज़ आती है। यह मधुर आवाज़ किसी स्त्री की कमर में बँधी करधनी से आती हुई प्रतीत होती है। इन्हीं मधुर आवाजों के कारण कवि को अरहर और सनई के खेत धरती की करधनी जैसे दिखाई देते हैं।

प्रश्न 5.
भाव स्पष्ट कीजिए-बालू के साँपों से अंकित गंगा की सतरंगी रेती।
हँसमुख हरियाली हिम-आतप सुख से अलसाए-से सोए।

उत्तर-गंगा-तट की रेत बल-खाते साँप की तरह लहरदार है और वह विविध रंगों वाली है।
हरियाली धूप के प्रकाश में जगमगाती हुई हँसमुख-सी लग रही है। सर्दी की धूप भी स्थिर और शांत है। उन्हें देखकर यों लगता है मानो दोनों अलसाकर एक-दूसरे के संग सो गए हों।

प्रश्न 6.
निम्न पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है?
तिनकों के हरे हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक
उत्तर-हरे-हरे’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
‘हरे-हरे’ ‘हिल-हरित’ में अनुप्रास अलंकार है।
‘हरित रुधिर’-रुधिर का रंग हरा बताने के कारण विरोधाभास अलंकार है।
‘तिनकों के हरे-भरे तन पर’ में रूपक एवं मानवीकरण अलंकार है।

प्रश्न 7.
इस कविता में जिस गाँव का चित्रण हुआ है वह भारत के किस भू-भाग पर स्थित है?
उत्तर-
इस कविता में गंगा के तट पर बसे गाँव का चित्रण हुआ है।

प्रश्न 8.
भाव और भाषा की दृष्टि से आपको यह कविता कैसी लगी? उसका वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर-
‘ग्राम श्री’ कविता में उस ग्रामीण सौंदर्य का चित्रण है जो लोगों के मन को अनायास अपनी ओर खींच लेता है। गाँव हरियाली से भरपूर है। यह खेतों में लहराती फ़सलें हैं जिन पर रंग-बिरंगे फूल खिले हैं तो दूसरी ओर फलों से लदे पेड़ भी हैं जिन पर पके फलं मुँह में पानी ला देते हैं।


कविता में गंगा की सतरंगी रेती और जल क्रीड़ा करते पक्षियों का चित्रण भी है। हरा-भरा गाँव देखकर लगता है कि यह मरकत का कोई डिब्बा हो। कविता की भाषा सरल सहज बोधगम्य, प्रवाहमयी है जिसमें चित्रमयता है। वर्णन इतना प्रभावी है कि सारा का सारा दृश्य आँखों के सामने साकार हो उठता है। कविता में अनुप्रास, रूपक मानवीकरण और विरोधाभास अलंकारों का सहज एवं स्वाभाविक प्रयोग है। इस तरह ग्राम श्री’ कविता भाव एवं भाषा की दृष्टि से उत्कृष्ट है।

प्रश्न 9.
आप जहाँ रहते हैं उस इलाके के किसी मौसम विशेष के सौंदर्य को कविता या गद्य में वर्णित कीजिए।
उत्तर-
मैं दिल्ली का रहने वाला हूँ। हमारा गाँव उस क्षेत्र में है जो यमुना नदी से मात्र एक-डेढ़ किलोमीटर ही दूर है। इस क्षेत्र में सरदी और गरमी दोनों ही खूब पड़ती हैं। मुझे गरमी का मौसम पसंद है। गरमी में यमुना के दोनों किनारों पर सब्जियों की खेती की जाती है जिससे हरियाली बढ़ जाती है। इन खेतों में जाकर खीरा, ककड़ी, खरबूजा, तरबूज आदि तोड़कर खाने का अपना अलग ही आनंद होता है। दोस्तों के साथ यमुना के उथले पानी में नहाने, रेत पर उछलने-कूदने और लोटने का मज़ा अलग ही है। इस ऋतु में सुबह-शाम जल क्रीड़ा करते हुए पक्षियों को निहारना सुखद लगता है। आम, फालसा, लीची आदि फल इसी समय खाने को मिलते हैं। यहाँ की हरियाली आँखों को बहुत अच्छी लगती है।

पाठेतर सक्रियता

प्रश्न 10.
सुमित्रानंदन पंत ने यह कविता चौथे दशक में लिखी थी। उस समय के गाँव में और आज के गाँव में आपको क्या परिवर्तन नज़र आते हैं? इस पर कक्षा में सामूहिक चर्चा कीजिए।
उत्तर-
छात्र परिचर्चा का आयोजन स्वयं करें।

प्रश्न 11.
अपने अध्यापक के साथ गाँव की यात्रा करें और जिन फ़सलों और पेड़-पौधों का चित्रण प्रस्तुत कविता में हुआ है, उनके बारे में जानकारी प्राप्त करें।
उत्तर-
छात्र अपने माता-पिता एवं अध्यापक की मदद से स्वयं जानकारी प्राप्त करें।

अन्य पाठेतर हल प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चाँदी की उजली जाली के समान किसे कहा गया है? यह जाली कहाँ दिखाई दे रही है?
उत्तर-
सूरज की सफ़ेद किरणों को चाँदी की उजली जाली के समान कहा गया है। यह जाली खेतों में दूर-दूर तक फैली हरियाली से लिपटी हुई दिखाई दे रही है।

प्रश्न 2.
तिनकों पर ओस की बूंदें देखकर कवि ने क्या नवीन कल्पना की है? और क्यों?
उत्तर-
तिनकों पर ओस की बूंदों को देखकर कवि ने हरे रक्त की नवीन कल्पना की है क्योंकि तिनकों पर पड़ी ओस की बूंदें हवा से हिल-डुल रही हैं। इससे बूंदें तिनकों के हरे रक्त-सी प्रतीत हो रही हैं।


प्रश्न 3.
‘ग्राम श्री’ कविता के आधार पर बताइए कि आकाश कैसा दिखाई दे रहा है?
उत्तर-
‘ग्राम श्री’ कविता से ज्ञात होता है कि आकाश चिर निर्मल विस्तृत नीले पर्दे या फलक के समान है। यह विशाल परदा हरी-भरी धरती पर झुका हुआ है।

प्रश्न 4.
धरती रोमांचित-सी क्यों लगती है? यह रोमांच किस तरह प्रकट हो रहा है?
उत्तर-
धरती रोमांचित-सी इसलिए लग रही है क्योंकि गेहूँ और जौ में बालियाँ आ गई हैं। जिस तरह रोमांचित होने पर हमारे शरीर के रोएँ खड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार गेहूँ जौ की बालियों में दानों पर लगे नुकीले भाग को देखकर लगता है कि ये धरती के रोम हैं जिनसे उसका रोमांच प्रकट हो रहा है।


प्रश्न 5.
सरसों फूलने का वातावरण पर क्या असर पड़ा है? इसे झाँककर कौन देख रहा है?
उत्तर-
सरसों के फूलने से वातावरण में तेल की गंध भर गई है जो हवा के साथ उडती फिर रही है। इस पीली-पीली फूली सरसों को अलसी की कली हरी-भरी धरती से झाँक-झॉक कर देख रही है।

प्रश्न 6.
खेतों में खड़ी मटर के सौंदर्य का वर्णन ‘ग्राम श्री’ कविता के आधार पर कीजिए।
उत्तर-
खेतों में मटर की फ़सल खड़ी है। उस पर रंग-बिरंगे फूल और फलियाँ आ चुकी हैं। इन फूलों को देखकर लगता है कि मटर सखियों के संग हँस रही है। वह अपनी मखमली पेटियों जैसे छीमियों में बीजों की लड़ी छिपा रखी है।

प्रश्न 7.
तितलियों के उड़ने से वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? इस दृश्य को देखकर कवि अनूठी कल्पना कर रहा है?
उत्तर-
पेड़-पौधे एवं फ़सलों पर रंग-बिरंगे सुंदर फूल खिले हैं। ये फूल हवा के साथ झूम रहे हैं तितलियाँ उड़ती-फिरती एक फूल से दूसरे फूल पर आ जा रही हैं। इससे वातावरण अत्यंत सुंदर बन गया है। इनको देखकर कवि यह कल्पना करता है कि स्वयं फूल ही उड़कर एक डाल से दूसरी डाल पर जा रहे हैं।


प्रश्न 8.
अमरूद, बेर और आँवला जैसे फल और उनके पेड़ कवि का मन क्यों लुभा रहे हैं?
उत्तर-
कच्चे हरे दिखाई देने वाले अमरूद अब पककर पीले हो गए हैं और उन पर लाल-लाल चित्तियाँ पड़ गई हैं। बेर के फल अब पककर सुनहरे और मीठे हो गए हैं। आँवले की डालियाँ अब छोटे-छोटे आँवलों से जड़ी हुई दिखाई दे रही हैं। इस कारण ये फल और पेड़ कवि का मेन लुभा रहे हैं।

प्रश्न 9.
कवि ने हरी थैली किसे कहा है और क्यों ?
उत्तर-
कवि ने शिमला मिर्च के पौधों पर आई बड़ी-बड़ी मिरचों को हरी थैली कहा है। ये मिर्च गुच्छों के रूप में इन पौधों पर लटक रहे हैं। इन्हें देखकर लगता है कि बड़ी-बड़ी हरी-हरी थैलियाँ लटक रही हैं।

प्रश्न 10.
कवि द्वारा हरियाली और तारों का किस तरह मानवीकरण किया गया है? ‘ग्राम श्री’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर-
हरियाली पर सरदियों की धूप पड़ने से लग रहा है कि हरियाली हँस रही है जो धूप के साथ मिलकर सुखपूर्वक अलसाई सी सो रही है। शाम के समय ओस पड़ने से रात भीगी-सी लग रही है। ऐसी रात में तारों को देखकर लगता है कि वे सपनों में खोए हुए हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रकृति सतत परिवर्तनशील है। ‘ग्राम श्री’ कविता में वर्णित आम, पीपल और ढाक के पेड़ों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
‘ग्राम श्री’ कविता में एक ओर दर्शाया गया है कि आम के पेड़ों पर अब सोने और चाँदी के रंग के बौर आ चुके हैं। इससे सारी डालियाँ मंजरियों-सी जड़ी हुई लग रही हैं। दूसरी ओर पीपल और ढाक के पेड़ अपनी पुरानी पत्तियाँ गिराते जा रहे हैं। पत्तियाँ गिरने से ढूँठ जैसे दिखने वाले ये पेड़ सौंदर्यहीन हो गए हैं जबकि आम के पेड़ का सौंदर्य बढ़ गया है। इस तरह एक ओर सौंदर्य की सृष्टि हो रही है तो दूसरी ओर समाप्ति। इस तरह हम कह सकते हैं कि प्रकृति सतत परिवर्तनशील है।

प्रश्न 2.
‘ग्राम श्री’ कविता में कुछ पेड़ वातावरण की सुंदरता में वृद्धि कर रहे हैं तो कुछ वातावरण को महका रहे हैं। वातावरण को सुगंधित बनाने वाले इन पेड़ों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
‘ग्राम श्री’ कविता में आम, अमरूद, आँवला आदि ऐसे अनेक पेड़ों का उल्लेख है जो वातावरण की सुंदरता बढ़ा रहे हैं तो कुछ पेड़ ऐसे भी हैं जो वातावरण को सुगंधित बना रहे हैं। ऐसे पेड़ों में कटहल, जामुन, आडू, नींबू, अनार आदि प्रमुख हैं। इन पर फूल आ गए हैं जिसकी सुगंध चारों तरफ़ फैल रही है। इसके अलावा खेतों में धनिया भी उगी है जो अपनी महक बिखेर रही है।


प्रश्न 3.
गंगा के किनारों का सौंदर्य देखकर कवि अभिभूत क्यों है? ‘भ श्री’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर-
गंगा के दोनों किनारों की चमकती रेत धूप में सतरंगी प्रतीत हो रही है। हवा से पानी के लहराने के कारण रेत पर टेढ़ी मेढी रेखाएँ बन गई हैं, जो साँपों के चलने से बनी हुई लगती है। इनके किनारे सरपत से लँकी हुई तरबूजों की खेती सुंदर लग रही है। इसी सरपत नामक लंबी-लंबी घास से बनी कुछ झोपड़ियाँ भी हैं, जिनमें बैठकर तरबूजों एवं सब्जियों की रखवाली की जाती है। पानी में पक्षी अपनी-अपनी क्रीड़ा में व्यस्त हैं। यह सब देखकर कवि अभिभूत है।



प्रश्न 4.
‘ग्राम श्री’ कविता के आधार पर गाँव के उस सौंदर्य का वर्णन कीजिए जिसके कारण वे जन-मन को आकर्षित कर रहे हैं?
उत्तर
गाँव में पेड़-पौधे एवं फ़सलों के कारण चारों ओर हरियाली फैली है। सरदियों की गुलाबी धूप पाकर यह हरियाली खिल उठती है। ऐसा लगता है कि जैसे धूप और हरियाली सुख से सोए हुए हैं। ओस भरी शांत रातों में तारों को देखकर लगता है कि वे जैसे सपनों में खोए हुए हैं। हरा-भरा गाँव पन्ना नामक हरे रत्न के खुले डिब्बे जैसा लग रहा है जिसको नीला आकाश आच्छादित किए हुए है। अपनी सुंदरता में अनूठे, सुंदर और शांत गाँव इतने अच्छे लग रहे हैं कि वे लोगों का मन अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।

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