संक्षिप्त में: संत कबीर दास जी ने यहाँ संकलित साखियों में जहाँ एक ओर प्रेम का गुण-गान किया है, वहीँ दूसरी तरफ उन्होंने आदर्श संत के लक्षणों के बारे में बताया है। उनके अनुसार एक आदर्श संत वही है, जो धर्म-जाति, ऊँच-नीच, छुआ-छूत आदि पर विश्वास नहीं करता। उन्होंने ज्ञान को सर्वश्रेष्ठ माना है और उनके अनुसार ज्ञान से बढ़ कर और कुछ भी नहीं है। उन्होंने अपनी रचनाओं में ये कहा है कि कोई भी अपनी जाति या काम से छोटा-बड़ा नहीं होता, बल्कि अपने ज्ञान से होता है। उन्होंने अपनी साखियों में उस समय समाज में फैले अन्धविश्वास तथा अन्य त्रुटियों का खुल कर विरोध किया है।
संक्षिप्त में: संत कबीर दास जी ने अपने पहले सबद की सहायता से एक ओर उस समय समाज में चल रहे विभिन्न आडम्बरों का विरोध किया है, वहीँ दूसरी ओर हमें ईश्वर को खोजने का सही रास्ता दिखाया है। उनका मानना है कि ईश्वर मंदिर-मस्जिद में नहीं, बल्कि खुद हमारे अंदर बसते हैं। उनके अनुसार ईश्वर जीव मात्र में उपस्थित है, ना कि मंदिर एवं मस्जिद में। अपने दूसरे सबद में कबीर ने ज्ञान की आँधी से होने वाले बदलावों के बारे में बताया है। कवि का कहना है कि जब ज्ञान की आँधी आती है, तो भ्रम की दीवारें टूट जाती हैं और मोहमाया के बंधन खुल जाते हैं। जब ऐसा होता है, तो मनुष्य को सत्य-असत्य का ज्ञान हो जाता है।
कबीर की साखी
मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।
मुकताफल मुकता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं।1।
प्रेमी ढ़ूँढ़त मैं फिरौं, प्रेमी मिले न कोइ।
प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ।2।
हस्ती चढ़िये ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि।3।
पखापखी के कारनै, सब जग रहा भुलान।
निरपख होइ के हरि भजै, सोई संत सुजान।4।
हिंदू मूआ राम कहि, मुसलमान खुदाई।
कहै कबीर सो जीवता, जे दुहुँ के निकटि न जाइ।5।
काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम।
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम।6।
उँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होई।
सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोई।7
कबीर की साखी अर्थ सहित – मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।
मुकताफल मुकता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं।1।
कबीर की साखी अर्थ सहित:- कबीर दास जी ने अपने इस दोहे में हमें यह बताया है कि मुक्ति का मार्ग हमें केवल प्रभु-भक्ति में ही मिल सकता है और उसी से हमें परम-आनंद की प्राप्ति होगी। इसी कारण से उन्होंने उपर्युक्त दोहे में हंसों का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो मानसरोवर के जल में क्रीड़ा करते हुए मोती चुग रहे हैं। उन्हें इस क्रीड़ा में इतना आनंद आ रहा है कि वो इसे छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहते।
ठीक इसी प्रकार, अगर मनुष्य भी खुद को ईश्वर की भक्ति में लीन कर लेगा और परम मोक्ष का आनंद प्राप्त कर लेगा, तो फिर उसका ध्यान कहीं और नहीं भटकेगा। उसे प्रभु की भक्ति में मिलने वाला आनंद और कहीं नहीं मिलेगा। फिर वह प्रभु की भक्ति में ही मग्न रहेगा और इस मार्ग को छोड़कर कहीं और नहीं जायेगा।
कठिन शब्दार्थ :
क्रीडा – खेल
प्रेमी ढ़ूँढ़त मैं फिरौं, प्रेमी मिले न कोइ।
प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ।2।
कबीर की साखी अर्थ सहित:- प्रस्तुत साखियों में संत कबीर दास जी ने संसार में सच्चे भक्तों की कमी के बारे में बताया है। जो व्यक्ति प्रभु की सच्ची भक्ति करता है, वह कभी भी दूसरे मनुष्य को उसकी जात, धर्म या काम के लिए नीचा नहीं समझता। वह सभी मनुष्यों को सामान भावना से देखेगा और हर मनुष्य से एक समान प्रेम करेगा।
कवि के अनुसार, जब दो सच्चे प्रभु-भक्त आपस में मिलते हैं, तो उनके बीच कोई भेद-भाव, ऊँच-नीच, क्लेश इत्यादि (विष जैसी) बुरी भावनाएं नहीं होतीं। साथ ही, जब दो सच्चे भक्त एक-दूसरे से मिलते हैं, तो नीची जात, दूसरे धर्म का व्यक्ति या अछूत व्यक्ति भी प्रेम का पात्र बन जाता है। इस तरह पाप भी पुण्य में परिवर्तित हो जाता है, लेकिन आज की दुनिया में दो सच्चे भक्तों का मिलन होना बहुत ही दुर्लभ है।
कठिन शब्दार्थ :
विष – ज़हर
हस्ती चढ़िये ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि।3।
कबीर की साखी अर्थ सहित:- कबीर दास जी ने प्रस्तुत पंक्तियों में हमें संसार के द्वारा की जाने वाली निंदा की परवाह किये बिना ज्ञान के मार्ग पर चलने का संदेश दिया है। उनके अनुसार, जब हाथी चलते हुए किसी गली-मोहल्ले से गुजरता है, तो गली के कुत्ते व्यर्थ ही भौंकना शुरू कर देते हैं। असल में, उनके भौंकने से कुछ बदलता नहीं है और हाथी उनके भौंकने की परवाह किए बिना स्वाभाविक रूप से सीधा अपने मार्ग में चलते जाता है।
ठीक इसी तरह कवि चाहते हैं कि हम अपने ज्ञान रूपी हाथी पर सवार होकर, इस समाज की निंदा की परवाह किये बिना, निरंतर भक्ति के मार्ग पर चलते रहे। कबीर जी के अनुसार, जब भी आप कोई ऐसा काम करेंगे, जो साधारण मनुष्य के लिए कठिन हो या फिर सबसे अलग हो, तो आपके आस-पड़ोस या समाज के लोग आपको ऐसी बातें कहेंगे, जिनसे आपका मनोबल कमजोर हो जाए। इसीलिए कवि चाहते हैं कि हम इन बातों को अनसुना करके, अपना मनोबल ऊँचा करके अपने कर्म पर ध्यान दें।
पखापखी के कारनै, सब जग रहा भुलान।
निरपख होइ के हरि भजै, सोई संत सुजान।4।
कबीर की साखी अर्थ सहित:- प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर दास जी ने हमें एक-दूसरे से तुलना की भावना को त्यागने का उपदेश दिया है। कवि के अनुसार, बिना किसी द्वेष-भाव के निष्पक्ष होकर प्रभु की भक्ति करना ही मोक्ष की प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है। जो लोग एक-दूसरे को जाति, धर्म, काम या धन के आधार पर छोटा-बड़ा समझते हैं, वो लोग सच्चे मन से प्रभु की भक्ति नहीं कर पाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो पाती। इसलिए हमें इन भेदभावों से ऊपर उठ कर, निष्पक्ष मन से भगवान की भक्ति करनी होगी, तभी हमारा कल्याण हो सकता है।
हिंदू मूआ राम कहि, मुसलमान खुदाई।
कहै कबीर सो जीवता, जे दुहुँ के निकटि न जाइ।5।
कबीर की साखी अर्थ सहित:- प्रस्तुत दोहे में कवि ने उस समय समाज में फैले हिन्दुओं व मुस्लिमों के आपसी भेदभाव का वर्णन किया है। कवि के अनुसार, उस समय समाज में हिन्दुओं तथा मुसलमानों में एक-दूसरे के प्रति काफी द्वेष था और वे एक-दूसरे के धर्म से घृणा करते थे। हिन्दू राम को महान समझते थे, जबकि मुसलमान खुदा को। मगर, दोनों राम और खुदा का नाम लेकर भी अपने ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सके, क्योंकि उनके मन में प्रभु की भक्ति से ज्यादा आपसी भेदभाव और नफ़रत की भावना मौजूद थी।
इसी वजह से संत कबीर दास जी ने हमें यह उपदेश दिया कि हिन्दू-मुस्लिम दोनों एक हैं और राम-खुदा दोनों ईश्वर के ही रूप हैं। इसलिए हमें आपसी भेदभाव को छोड़कर सर्वश्रेष्ठ ईश्वर (फिर चाहे वो राम हो या फिर खुदा) की भक्ति में लीन हो जाना चाहिए। तभी हम मोक्ष को प्राप्त कर पाएंगे।
काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम।
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम।6।
कबीर की साखी अर्थ सहित:- प्रस्तुत दोहे में कबीर दास जी ने हिन्दू-मुसलमान के आपसी भेदभाव को नष्ट करने का संदेश दिया है। कवि का मानना है कि अगर कोई हिन्दू या मुसलमान आपसी भेदभाव को छोड़कर, निष्पक्ष होकर प्रभु की भक्ति में लीन हो जाए, तो उसे मंदिर-मस्जिद एक-समान लगने लगेंगे। फिर उसे राम व रहीम एक ही ईश्वर के दो रूप लगने लगेंगे, जिनमें कोई अंतर नहीं होगा। इस प्रकार हिन्दुओं व मुसलमानों को मस्जिद तथा मंदिर एकसमान रूप से पवित्र लगने लगेंगे।
कवि कहते हैं कि जब तक गेहूं को बारीक़ पीसा नहीं जाता, वो खाने योग्य नहीं होता है, लेकिन जैसे ही गेंहू को पीस दिया जाता है, वो स्वादिष्ट खाना बनाने लायक बन जाता है। ठीक इसी तरह, हमें अपने बुरे भावों और विचारों को एकता की चक्की में पीस कर सदभावना के आटे में बदलना होगा। फिर हमें एक-दूसरे के धर्म में कोई बुराई नहीं दिखेगी, हमें उनमें केवल प्रभु की भक्ति का संदेश ही दिखाई देगा। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन हिन्दू-मुसलमान एकसाथ बैठ कर प्रेम से खाना खाएंगे।
उँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होई।
सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोई।7।
कबीर की साखी अर्थ सहित:- पहले के समय में व्यक्ति को उसके कुल से बड़ा समझा जाता था, ना कि उसके कर्म और ज्ञान से। इसी वजह से कवि ने इन दोहों में हमें यह सन्देश दिया है कि कोई भी व्यक्ति अपने कुल से नहीं बल्कि अपने कर्मो से बड़ा होता है।
जैसे, अगर एक सोने के मटके में मदिरा भरी हो, तो वह किसी साधु के लिए मूल्यहीन हो जाता है। सोना का बना होने पर भी उसका कोई महत्व नहीं रहता। ठीक वैसे ही, बड़े कुल में पैदा होने के बाद भी अगर कोई व्यक्ति बुरे कर्म करे और दूसरों के परोपकार से जुड़े महान काम ना करे, तो वह बड़ा कहलाने लायक नहीं है। इसलिए हमें किसी मनुष्य को उसके कुल से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से पहचानना चाहिए।
कबीर के दोहे “सबद”
(1)
मोकों कहाँ ढ़ूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में।
ना तो कौने क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तालास में।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वाँसो की स्वाँस में।।
(2)
संतौं भाई आई ग्याँन की आँधी रे।
भ्रम की टाटी सबै उड़ाँनी, माया रहै न बाँधी॥
हिति चित्त की द्वै थूँनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।
त्रिस्नाँ छाँनि परि घर ऊपरि, कुबधि का भाँडाँ फूटा।।
जोग जुगति करि संतौं बाँधी, निरचू चुवै न पाँणी।
कूड़ कपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जाँणी॥
आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।
कहै कबीर भाँन के प्रगटे उदित भया तम खीनाँ॥
मोकों कहाँ ढ़ूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में।
ना तो कौने क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तालास में।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वाँसो की स्वाँस में।।
कबीर के दोहे अर्थ सहित:- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने मनुष्य को यह सन्देश दिया है कि ईश्वर तो सर्व-व्यापी हैं, यानी कि भगवान हर जगह मौजूद हैं। हम उन्हें मंदिर-मस्ज़िद और तमाम तीर्थों व धामों में ढूंढते रहते हैं, लेकिन असल में, वो हर वक़्त हमारे पास ही रहते हैं। कबीर जी ने बताया है कि ईश्वर को पाने के लिए सैकड़ों क्रियाकर्म और कठिन योग साधना करना ज़रूरी नहीं है। अगर कोई भक्त उन्हें सच्ची श्रृद्धा और विश्वास के साथ याद करेगा, तो वो उसे एक पल में ही मिल जाएंगे।
कवि की इन पंक्तियों में ईश्वर मनुष्य से कहते हैं कि हे मनुष्य! तुम मुझे बाहर मंदिर-मस्जिदों में कहाँ ढूंढ़ते फिर रहे हो? मैं तो तुम्हारे पास ही हूँ! अगर तुम्हारे मन में मेरे प्रति सच्ची श्रृद्धा और विश्वास है, तो मैं हर वक़्त तुम्हारे पास मौजूद हूँ और तुम मुझे हर प्राणी की सांसों में महसूस कर सकोगे। लेकिन, अगर तुम्हारे मन में सच्चाई और आस्था नहीं है, तो फिर मैं तुम्हें मंदिर-मस्ज़िद और क़ाबा-कैलाश जैसी पवित्र जगहों पर भी नहीं मिल पाउँगा। अगर मुझे पाना है, तो खुद के अंतर्मन में झांक कर देखो, मैं तुम्हें वहीँ मिलूँगा!
संतौं भाई आई ग्याँन की आँधी रे।
भ्रम की टाटी सबै उड़ाँनी, माया रहै न बाँधी॥
हिति चित्त की द्वै थूँनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।
त्रिस्नाँ छाँनि परि घर ऊपरि, कुबधि का भाँडाँ फूटा।।
जोग जुगति करि संतौं बाँधी, निरचू चुवै न पाँणी।
कूड़ कपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जाँणी॥
आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।
कहै कबीर भाँन के प्रगटे उदित भया तम खीनाँ॥
कबीर के दोहे अर्थ सहित:- कबीर दास जी ने इस पद में हमें यह शिक्षा दी है कि सांसारिक मोहमाया, स्वार्थ, धनलिप्सा, तृष्णा, कुबुद्धि इत्यादि बुराइयाँ मनुष्य में तभी तक मौजूद रहती हैं, जब तक उसे आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता। जैसे ही मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है, उसके अंदर स्थित सारी सांसारिक बुराइयों और वासनाओं का अंत हो जाता है।
यहाँ कवि कहते हैं कि जब ज्ञान की आंधी आती है, तो सांसारिक भ्रम रूपी बांस की टट्टरों (छप्परों) को माया रूपी रस्सियाँ बाँध कर नहीं रख पातीं और वो ज्ञान की आंधी में तिनके की तरह उड़ जाती हैं।
सांसारिक भ्रम की छत को सहारा देने वाले स्वार्थ और लालच रूपी खम्बे भी ज्ञान की आँधी में गिर जाते हैं। इसी तरह सच्चा ज्ञान, मोह रूपी सांसारिक बंधन का भी नाश कर देता है। एक-एक करके सभी सहारे हट जाने की वजह से तृष्णा-रूपी छत भी धरती पर आकर गिर गयी है और इसकी वजह से कुबुद्धि रूपी सब बर्तन भी टूट गए हैं।
इसके बाद साधु-संतो ने अपनी योग-साधना की कड़ी मेहनत से एक बहुत ही मजबूत छत का निर्माण किया है, जिसमें से अज्ञान और सांसारिक मोह-माया रूपी पानी की एक बून्द भी नहीं टपकती है। इस घर में मनुष्य के भटकने के लिए कोई राह नहीं है, यहां केवल आध्यात्म और प्रभु की भक्ति की ही एकमात्र राह है।
आगे कवि कहते हैं, ज्ञान की इस आंधी के बाद ईश्वर के प्रेम का मधुर जल हर मनुष्य को भिगो देता है और उनके मन के सारे मैल धुल जाते हैं। फिर जब ज्ञान रूपी सूर्य का उदय होता है, तो हमारे अंदर स्थित सारे अज्ञान के अन्धकार का अंत हो जाता है।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
साखियाँ
प्रश्न 1.
‘मानसरोवर’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर-
मानसरोवर के दो अर्थ हैं-एक पवित्र सरोवर जिसमें हंस विहार करते हैं।
पवित्र मन या मानस।
प्रश्न 2.
कवि ने सच्चे प्रेमी की क्या कसौटी बताई है?
उत्तर-
कवि ने सच्चे प्रेमी की यह कसौटी बताई है कि उसका मन विकारों से दूर तथा पवित्र होता है। इस पवित्रता का असर मिलने वाले पर पड़ता है। ऐसे प्रेमी से मिलने पर मन की पवित्रता और सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
प्रश्न 3.
तीसरे दोहे में कवि ने किस प्रकार के ज्ञान को महत्त्व दिया है?
उत्तर-
इस दोहे में अनुभव से प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान को महत्त्व दिया गया है।
प्रश्न 4.
इस संसार में सच्चा संत कौन कहलाता है?
उत्तर-
इस संसार में सच्चा संत वही है जो जाति-धर्म, संप्रदाय आदि के भेदभाव से दूर रहता है, तर्क-वितर्क, वैर-विरोध और राम-रहीम के चक्कर में पड़े बिना प्रभु की सच्ची भक्ति करता है। ऐसा व्यक्ति ही सच्चा संत होता है।
प्रश्न 5.
अंतिम दो दोहों के माध्यम से कबीर ने किस तरह की संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है?
उत्तर-
अंतिम दो दोहों में कबीर ने निम्नलिखित संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है-अपने-अपने मत को श्रेष्ठ मानने की संकीर्णता और दूसरे के धर्म की निंदा करने की संकीर्णता।
ऊँचे कुल के अहंकार में जीने की संकीर्णता।
प्रश्न 6.
किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कुल से होती है या उसके कर्मों से? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर-
किसी व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से होती है, कुल से नहीं। कोई व्यक्ति यदि ऊँचे कुल में जन्म लेकर बुरे कर्म करता है तो वह निंदनीय होता है। इसके विपरीत यदि साधारण परिवार में जन्म लेकर कोई व्यक्ति यदि अच्छे कर्म करता है तो समाज में आदरणीय बन जाता है सूर, कबीर, तुलसी और अनेकानेक ऋषि-मुनि साधारण से परिवार में जन्मे पर अपने अच्छे कर्मों से आदरणीय बन गए। इसके विपरीत कंस, दुर्योधन, रावण आदि बुरे कर्मों के कारण निंदनीय हो गए।
प्रश्न 7.
काव्य सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-
हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है, भेंकन दे झख मारि।
उत्तर-
इसमें कवि ने एक सशक्त चित्र उपस्थित किया है। सहज साधक मस्ती से हाथी पर चढ़े हुए जा रहे हैं।
और संसार-भर के कुत्ते भौंक-भौंककर शांत हो रहे हैं परंतु वे हाथी का कुछ बिगाड़ नहीं पा रहे। यह चित्र निंदकों पर व्यंग्य है और साधकों के लिए प्रेरणा है।
सांगरूपक अलंकार का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया गया है
ज्ञान रूपी हाथी
सहज साधना रूपी दुलीचा
निंदक संसार रूपी श्वान
निंदा रूपी भौंकना
‘झख मारि’ मुहावरे का सुंदर प्रयोग।
‘स्वान रूप संसार है’ एक सशक्त उपमा है।
सबद (पद)
प्रश्न 8.
मनुष्य ईश्वर को कहाँ-कहाँ ढूँढ़ता फिरता है?
उत्तर-
मनुष्य अपने धर्म-संप्रदाय और सोच-विचार के अनुसार ईश्वर को मंदिर, मस्जिद, काबा, कैलाश जैसे पूजा स्थलों और धार्मिक स्थानों पर खोजता है। ईश्वर को पाने के लिए कुछ लोग योग साधना करते हैं तो कुछ सांसारिकता से दूर होकर संन्यासी-बैरागी बन जाते हैं और इन क्रियाओं के माध्यम से ईश्वर को पाने का प्रयास करते हैं।
प्रश्न 9.
कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति के लिए किन प्रचलित विश्वासों का खंडन किया है?
उत्तर-
कबीर ने ईश्वर प्राप्ति के प्रचलित विश्वासों का खंडन किया है। उनके अनुसार ईश्वर ने मंदिर में है, न मसजिद में; न काबा में है, न कैलाश आदि तीर्थ यात्रा में; वह न कर्मकांड करने में मिलता है, न योग साधना से, न वैरागी बनने से। ये सब ऊपरी दिखावे हैं, ढोंग हैं। इनमें मन लगाना व्यर्थ है।
प्रश्न 10.
कबीर ने ईश्वर को ‘सब स्वाँसों की स्वाँस में क्यों कहा है?
उत्तर-
कबीर का मानना था कि ईश्वर घट-घट में समाया है। वह प्राणी की हर साँस में समाया हुआ है। उसका वास प्राणी के मन में ही है।
प्रश्न 11.
कबीर ने ज्ञान के आगमन की तुलना सामान्य हवा से न कर आँधी से क्यों की?
उत्तर-
कबीर के अनुसार, जब प्रभु ज्ञान का आवेश होता है तो उसका प्रभाव चमत्कारी होता है। उससे पूरी जीवन शैली बदल जाती है। सांसारिक बंधन पूरी तरह कट जाते हैं। यह परिवर्तन धीरे-धीरे नहीं होता, बल्कि एकाएक और पूरे वेग से होता है। इसलिए उसकी तुलना सामान्य हवा से न करके आँधी से की गई है।
प्रश्न 12.
ज्ञान की आँधी का भक्त के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
ज्ञान की आँधी आने से भक्त के जीवन पर अनेक प्रभाव पड़ते हैं-भक्त के मन पर छाया अज्ञानता का भ्रम दूर हो जाता है।
भक्त के मन का कूड़ा-करकट (लोभ-लालच आदि) निकल जाता है।
मन में प्रभु भक्ति का भाव जगता है।
भक्त का जीवन भक्ति के आनंद में डूब जाता है।
प्रश्न 13.
भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) हिति चित्त की वै श्रृंनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।
(ख) आँधी पीछे जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भीनाँ।
उत्तर-
इसका भाव यह है कि ईश्वरीय ज्ञान हो जाने के बाद प्रभु-प्रेम के आनंद की वर्षा हुई। उस आनंद में भक्त का हृदय पूरी तरह सराबोर हो गया।
रचना और अभिव्यक्ति
प्रश्न 14.
संकलित साखियों और पदों के आधार पर कबीर के धार्मिक और सांप्रदायिक सद्भाव संबंधी विचारों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
पाठ में संकलित साखियों से ज्ञात होता है कि कबीर समाज में फैले जाति-धर्म के झगड़े, ऊँच-नीच की भावना, मनुष्य का हिंदू-मुसलमान में विभाजन आदि से मुक्त समाज देखना चाहते थे। वे हिंदू-मुसलमान के रूप में राम-रहीम के प्रति कट्टरता के घोर विरोधी थे। वे समाज में सांप्रदायिक सद्भाव देखना चाहते थे। कबीर चाहते थे कि समाज को कुरीतियों से मुक्ति मिले। इसके अलावा उन्होंने ऊँचे कुल में जन्म लेने के बजाए साधारण कुल में जन्म लेकर अच्छे कार्य करने को श्रेयस्कर माना है।
भाषा अध्ययन
प्रश्न 15.
निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए-
पखापखी, अनत, जोग, जुगति, बैराग, निरपख.
उत्तर-
पखापखी – पक्ष-विपक्ष
अनत – अन्यत्र
जोग – योग
जुगति – युक्ति
बैराग – वैराग्य
निष्पक्ष – निरपख
पाठेतर सक्रियता
प्रश्न 16.
कबीर की साखियों को याद कर कक्षा में अंत्याक्षरी का आयोजन कीजिए।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।
अन्य पाठेतर हल प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
हंस किसके प्रतीक हैं? वे मानसरोवर छोड़कर अन्यत्र क्यों नहीं जाना चाहते हैं?
उत्तर-
हंस जीवात्मा के प्रतीक हैं। वे मानसरोवर अर्थात् मेन रूपी सरोवर को छोड़कर अन्यत्र इसलिए जाना चाहते हैं क्योंकि उसे प्रभु भक्ति का आनंद रूपी मोती चुगने को मिल रहे हैं। ऐसा आनंद उसे अन्यत्र दुर्लभ है।
प्रश्न 2.
कबीर ने सच्चा संत किसे कहा है? उसकी पहचान बताइए।
उत्तर-
कबीर ने सच्चा संत उसे कहा है जो हिंदू-मुसलमान के पक्ष-विपक्ष में न पड़कर इनसे दूर रहता है और दोनों को समान दृष्टि से देखता है, वही सच्चा संत है। उसकी पहचान यह है कि किसी धर्म/संप्रदाय के प्रति कट्टर नहीं होता है और प्रभुभक्ति में लीन रहता है।
प्रश्न 3.
कबीर ने ‘जीवित’ किसे कहा है?
उत्तर-
कबीर ने उस व्यक्ति को जीवित कहा है जो राम और रहीम के चक्कर में नहीं पड़ता है। इनके चक्कर में पड़े व्यक्ति राम-राम या खुदा-खुदा करते रह जाते हैं पर उनके हाथ कुछ नहीं लगता है। इन दोनों से दूर रहकर प्रभु की सच्ची भक्ति करने वालों को ही कबीर ने ‘जीवित’ कहा है।
प्रश्न 4.
‘मोट चून मैदा भया’ के माध्यम से कबीर क्या कहना चाहते हैं?
उत्तर-
मोट चून मैदा भया के माध्यम से कबीर कहना चाहते हैं कि हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों की बुराइयाँ समाप्त हो गई और वे अच्छाइयों में बदल गईं। अब मनुष्य इन्हें अपनाकर जीवन सँवार सकता है।
प्रश्न 5.
कबीर ‘सुबरन कलश’ की निंदा क्यों करते हैं?
उत्तर-
कबीर ‘सुबरन कलश’ की निंदा इसलिए करते हैं क्योंकि कलश तो बहुत महँगा है परंतु उसमें रखी सुरा व्यक्ति के लिए हर तरह से हानिकारक है। सुरा के साथ होने के कारण सोने का पात्र निंदनीय बन गया है।
प्रश्न 6.
‘सुबरन कलश’ किसका प्रतीक है? मनुष्य को इससे क्या शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए?
उत्तर-
‘सुबरन कलश’ अच्छे और प्रतिष्ठित कुल का प्रतीक है जिसमें जन्म लेकर व्यक्ति अपने-आप को महान समझने लगता है। व्यक्ति तभी महान बनता है जब उसके कर्म भी महान हैं। इससे व्यक्ति को अच्छे कर्म करने की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
प्रश्न 7.
कबीर मनुष्य के लिए क्रिया-कर्म और योग-वैराग्य को कितना महत्त्वपूर्ण मानते हैं?
उत्तर-
कबीर मनुष्य के लिए क्रिया-कर्म और योग-वैराग्य को महत्त्वपूर्ण नहीं मानते हैं क्योंकि मनुष्य इन क्रियाओं के माध्यम से ईश्वर को पाने का प्रयास करता है, जबकि कबीर के अनुसार ईश्वर को इन क्रियाओं के माध्यम से नहीं पाया जा सकता है।
प्रश्न 8.
मनुष्य ईश्वर को क्यों नहीं खोज पाता है?
उत्तर-
मनुष्य ईश्वर को इसलिए नहीं खोज पाता है क्योंकि वह ईश्वर का वास मंदिर-मस्जिद जैसे धर्मस्थलों और काबा-काशी जैसी पवित्र मानी जाने वाली जगहों पर मानता है। वह इन्हीं स्थानों पर ईश्वर को खोजता-फिरता है। वह ईश्वर को अपने भीतर नहीं खोजता है।
प्रश्न 9.
कबीर ने संसार को किसके समान कहा है और क्यों?
उत्तर-
कबीर ने संसार को श्वान रूपी कहा है क्योंकि जिस तरह हाथी को जाता हुआ देखकर कुत्ते अकारण भौंकते हैं उसी तरह ज्ञान पाने की साधना में लगे लोगों को देखकर सांसारिकता में फँसे लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगते हैं। वे ज्ञान के साधक को लक्ष्य से भटकाना चाहते हैं।
प्रश्न 10.
कबीर ने ‘भान’ किसे कहा है? उसके प्रकट होने पर भक्त पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
कबीर ने ‘भान’ (सूर्य) ज्ञान को कहा है। ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होने पर मनुष्य के मन का अंधकार दूर हो जाता है। इस अंधकार के दूर होने से मनुष्य के मन से कुविचार हट जाते हैं। वह प्रभु की सच्ची भक्ति करता है और उस आनंद में डूब जाता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए कि कबीर खरी-खरी कहने वाले सच्चे समाज सुधारक थे।
उत्तर-
कबीर ने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों और बुराइयों को अत्यंत निकट से देखा था। उन्होंने महसूस किया कि सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता, भक्ति का आडंबर, मूर्तिपूजा, ऊँच-नीच की भावना आदि प्रभु-भक्ति के मार्ग में बाधक हैं। उन्होंने ईश्वर की वाणी को जन-जन तक पहुँचाते हुए कहामोको केही ढूँढे बंदे मैं तो तेरे पास में। इसके अलावा ऊँचे कुल में जन्म लेकर महान कहलाने वालों के अभिमान पर चोट करते हुए कहा-‘सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोय’। इससे स्पष्ट होता है कि कबीर खरी-खरी कहने वाले सच्चे समाज-सुधारक थे।
प्रश्न 2.
ज्ञान की आँधी आने से पहले मनुष्य की स्थिति क्या थी? बाद में उसकी दशा में क्या-क्या बदलाव आया? पठित ‘सबद’ के आधार पर लिखिए।
उत्तर-
ज्ञान की आँधी आने से पहले मनुष्य का मन मोह-माया, अज्ञान तृष्णा, लोभ-लालच और अन्य दुर्विचारों से भरा था। वह सांसारिकता में लीन था, इससे वह प्रभु की सच्ची भक्ति न करके भक्ति का आडंबर करता था। ज्ञान की आँधी आने के बाद मनुष्य के मन से अज्ञान का अंधकार और कुविचार दूर हो गए। उसके मन में प्रभु-ज्ञान का प्रकाश फैल गया। वह प्रभु की सच्ची भक्ति में डूबकर उसके आनंद में सराबोर हो गया।

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